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एक अद्वितीय शिक्षा-पद्धति
May 1, 2017 • E. Hemant Kumar

गुरुकुल का नाम सुनते ही मन- मस्तिष्क में वृक्ष के नीचे चबूतरे पर बैठे ऋषि/गुरु उनके सामने एकाग्रचित्त शिष्य, आसपास नदी-झील तथा घूमते पशु-पक्षियों की छवि सहज की उभर आती है। विश्वभर को भारत की अनेक परम्पराओं ने आकर्षित तथा प्रभावित किया है। गुरुकुल-पद्धति द्वारा समाज को बौद्धिक पोषण तथा शिक्षित करना उनमें से एक महान् परम्परा के रूप में जानी जाती है। नालन्दा तथा तक्षशिला भी गुरुकुल-परम्परा के उन्नत स्वरूप के शिक्षा-केन्द्र थे जहाँ आस-पास के अनेक देशों से विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने आते थे। राज्य अथवा समाज द्वारा पोषित इन गुरुकुलों में शिक्षक बिना वेतन के शिक्षण-कार्य करते थे तथा विद्यार्थियों को निःशुल्क शिक्षा मिलती थी। ‘शिक्षार्थ आइये, सेवार्थ जाइये' इनका मूलमंत्र था। हजारों सालों तक गुरुकुल- परम्परा सिरमौर शिक्षा-पद्धति रही है। वर्तमान में यह संघर्षशील तथा लुप्तप्राय है। अनेकानेक कारणों से यह लोकप्रिय नहीं रही, परन्तु इसके मूल तत्त्वों एवं उद्देश्यों का सार आज भी प्रासंगिक है। गुरुकुल-परम्परा को ठीक से समझने के लिए शिक्षा की आवश्यकता को समझना जरूरी है।

शिक्षा की आवश्यकता तथा उसके बुनियादी तत्त्व 

आम धारणा है कि अधिक-से-अधिक धन कमाने के लिए पढ़ा-लिखा होना जरूरी है। या पढ़े-लिखे व्यक्ति को सम्मान अधिक मिलता है। परन्तु ऐसा मानने से शिक्षा के पूर्ण स्वरूप की जानकारी नहीं मिल पाती। शिक्षा का मूल उद्देश्य व्यक्ति की पाशविक प्रवृत्तियों का उन्मूलन करना, उसकी नैसर्गिक क्षमताओं से परिष्कार और वृद्धि करना तथा उसे एक जिम्मेदार एवं सभ्य नागरिक बनाकर समाज के हित में निःस्वार्थ भाव से लगाना है। व्यक्तिगत धनोपार्जन गौण तथा दूसरे दर्जे का लक्ष्य है।

अच्छी शिक्षा से ही मूल्यों के प्रति निष्ठावान्, दृढ़, मानवीय गुणों से परिपूर्ण तथा जाग्रत् चरित्र का निर्माण हो सकता है। अच्छी शिक्षा व्यक्ति विशेष को ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण समाज को खुशहाल, विकसित तथा एकभावी करने की सबसे सस्ती, सरल तथा प्रभावी तरीका है।

उक्त उद्देश्यों को पूरा करने के लिए शिक्षा-व्यवस्था का सुव्यवस्थित होना ज़रूरी है। शिक्षकगणों की बौद्धिकता, पठन-पाठन की विषय-वस्तु और सामग्री, शिक्षक-विद्यार्थियों का परस्पर सम्बन्ध एवं अनुशासन, विद्यालय का भौतिक स्वरूप और सुविधासम्पन्नता, संस्था का निजी उद्देश्य, पाठ्यक्रम की प्रगतिशीलता शिक्षा-प्रणाली के प्रमुख बुनियादी तत्त्व हैं। संस्था को स्थापित करने, सञ्चालित करने, शिक्षकों के वेतन और अध्ययन-सामग्री की व्यवस्था करने के लिए आर्थिक स्रोत, संस्था की सामाजिक स्वीकार्यता तथा प्रेरणाशीलता अन्य बुनियादी तत्त्व हैं। भारत में प्राचीन काल से ही शिक्षा के प्रभाव तथा उसके समाज से सुचारू प्रवाह पर खूब विचार किया गया। गुरुकुल इसके प्रत्यक्ष प्रमाण माने जा सकते हैं, क्योंकि इनकी स्थापना में ऊपर वर्णित आदर्शों की झलक मिलती है।

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