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एकात्म मानव-दर्शन
December 1, 2016 • Prof. Bhuvneshar Prasad Gurumehta

एकात्मता के सिद्धांत के प्रति निष्ठा एवं संकल्प भारतीय साहित्य एवं • संस्कृति की अमरता का रहस्य है। सुदूर वैदिक काल से ही भारत का मानस अपने नागरिकों के प्रति सद्भावनापूर्ण रहा है। इसी एकात्म बोध के अमृत का पान करके यह अपने प्रजाजन और संस्कृति के नित-नूतन विकास का साक्षी बनकर आज तक जीवित है। वस्तुतः भारतीय साहित्य एकात्मता के विपुल दृष्टान्तों से ओत- प्रोत है।

भारत की अमरता का रहस्य इसका महनीय सिद्धांत है। तभी तो मुहम्मद इकबाल ने हमारे देश की संस्कृति की अमरता के विषय में कहा है।

यूनान मिस्र रोमां सब मिट गए जहां से बाकी बचा है अब तक नामो-निशां हमारा कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी 

यूनान, मिस्र और रोम-प्रभृति विश्व के बड़े-बड़े साम्राज्यों का निर्माण हुआ और सब-के-सब काल के गाल में समा गयेवहाँ की संस्कृति मिट्टी में मिल गयीलेकिन ऐसी कौन-सी बात है कि हमारी हस्ती मिटती नहीं? हमारा सिद्धांत ही इतना उच्च है जिसके लिए कहा गया है कि कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी। गीता में इस पावन सिद्धांत अर्थात् आयडियोलॉजी को अधिष्ठानम्' कहा गया है। वहाँ कर्म करने के पाँच श्रेष्ठ साधनों में भगवान् कृष्ण ने अधिष्ठान को सबसे पहले महत्त्व दिया है :

अधिष्ठानम् तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्।

विविधाश्च पृथक्केष्टा देवं चैवात्र पञ्चमम्॥

सुदृढ़ अधिष्ठान होने के कारण हमारा राष्ट्र बराबर चलता आ रहा है जबकि संसार में न जाने कितने साम्राज्य निर्मित हुए और ध्वस्त हो गए। हमारे राष्ट्र को अमरता दिलाने में हमारे सिद्धांत यानी ‘आइडियोलॉजी' का महत्त्व सर्वाधिक है। किसी श्रेष्ठ विचारक ने कहा है कि सिद्धान्त अपने पैरों पर खड़े रहते हैं (प्रिंसिपल स्टैण्ड्स ऑन इट्स ओन लेग्स)। कारण यह है कि सिद्धांत पर अटल निष्ठा हो, तो विपरीत और विषम परिस्थितियों में भी राष्ट्र स्वाभिमानपूर्वक जीवित रहता है। अपने प्राचीन एवं अमर राष्ट्र के आधारभूत सिद्धांत के विषय में यदि विवेचन करनी हो तो हम कहेंगे- ‘आत्मनो मोक्षार्थम् जगद्धिताय च। अपने मोक्ष के लिए, अपने विकास के लिए और संपूर्ण जगत् के कल्याण के लिए हमने सदैव विचार किया है।

विश्व-कल्याण की भावना

मानव तो क्या, हम लोग चींटियों को भी चीनी खिलाने में विश्वास रखते हैं। विश्व- कल्याण का विचार हमारा प्रथम लक्ष्य हैऔर उसके लिए प्रत्येक व्यक्ति के आत्मविकास की मंगल कामना करते हैं, जिससे वह विश्व-कल्याण का उत्तम साधन बन सके

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्॥

सभी सुखी रहें, नीरोग रहें, निर्भय रहें, आपस में प्यार से रहें, किसी को मेरे कारण लेशमात्र भी कष्ट न हो; मानव कल्याण के लिए इस संकल्प को कार्यरूप दें। इसी को दूसरे ढंग से 'एकात्म मानव दर्शन' कहा गया है। यही वास्तव में सनातन-धर्म है।

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