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एकं सविप्राः बहुधा वदन्ति
February 1, 2017 • Parmod Kumar Kaushik

'हम हिंदुओं को सिख, बौद्ध, जैन आदि पंथों में करके नहीं देखते हैं। हमारा मानना है कि देश में निर्मित ईश्वरप्राप्ति के बौद्ध, जैन, सिख, शैव, वैष्णव, वीरशैव आदि सभी पंथ व्यापक 'हिंदू' शब्द में अंतर्भूत हैं।' | -श्री माधवराव सदाशिवराव गोळवळकर (श्रीगुरुजी समग्र, खण्ड 9, पृ. 25)

सनातन-धर्म एक जीवन-पद्धति अथवा जीवन-दर्शन है जो धर्मपूर्वक अर्थ और काम का उपभोग करते हुए मोक्ष को परम लक्ष्य मानकर व्यक्ति और समाज को आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक उन्नति के अवसर प्रदान करता है। हिंदू समाज किसी एक ईश्वर की पूजा नहीं करता, किसी एक मत का अनुयायी नहीं है, किसी एक व्यक्ति द्वारा प्रतिपादित या किसी एक पुस्तक में संकलित विचारों या मान्यताओं से बँधा हुआ नहीं है, वह किसी एक दार्शनिक विचारधारा को नहीं मानता और न ही किसी एक प्रकार की मजहबी उपासना-पद्धति या आचार-पद्धति में ही जकड़ा है। आज हम जिस संस्कृति को हिंदू-संस्कृति के रूप में जानते हैं और जिसे भारतीय या भारतीय मूल के लोग सनातन-धर्म कहते हैं, वह उस मजहब या रिलीजन से बड़ा सिद्धान्त है जिसे पश्चिम के लोग समझते हैं।

इस प्रकार सनातन-धर्म एक व्यवस्था है जिसमें विचार-अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता रही है। इसे समझने के लिए हम किसी एक ऋषि या द्रष्टा अथवा किसी एक पुस्तक पर निर्भर नहीं रह सकते। ऋषियों, संतों, मनीषियों ने समय-समय पर देश-काल-परिस्थिति के अनुसार समाज-संचालन के लिए विचार, दृष्टिकोण और मार्ग सुझाए। इसलिए ये कभी एक दूसरे के पूरक होते हैं तो कभी विरोधी। इन सभी विचारों, दृष्टिकोणों और मार्गों का समादर ही सनातन-धर्म है। यह सनातन-धर्म अनेक वर्ण, अवान्तर वर्ण, जाति और अंतर्जातियों में स्वेछा से परिपालित आचार और विचार की समष्टि है। वृक्ष-पूजा, नाग-पूजा, भूमि-पूजा आदि भौमिक मान्यताओं से लेकर वेदान्त-प्रतिपादित औपनिषद पुरुष या श्रुति-प्रतिपादित ब्रह्मतत्त्व तक विचारों और आचारों के अनेक भेद सनातन-धर्म के अंग हैं। श्री वैष्णव, रुद्र, माध्व, सनक, राधावल्लभ, हरिदासी, स्वामीनारायण, प्रणामी, पाञ्चरात्र, नारायणी, दशनामी, नाथ, कापालिक, लिंगायत या वीरशैव, पाशुपत, अघोर, दक्षिणाचारी, वामाचारी, सौर, शाक्त, गाणपत्य, नारसिंह, स्मार्त, रामानन्दी, श्वेताम्बर, दिगम्बर, हीनयान, महायान, वज्रयान, सिख, रामरंजा, खालसा, अकाली, उदासी, नामधारी, निरंजनी, निरंकारी, राधास्वामी, आदि भारतवर्ष से निकले ये सभी मत-मतांतर सनातन-धर्म की शाखाएँउपशाखाएँ हैं। यह धर्म सबको स्वीकार करते हुए, सबको साथ लेकर चलता है। सबके साथ सम्प्रीति और समन्वय, सनातन-धर्म की विशेषता है। प्रत्येक बारह वर्ष पर आयोजित होनेवाले महाकुम्भ में ऊपर से ‘अनेक' दिखनेवाले ये सभी सम्प्रदाय उत्साहपूर्वक एकत्र होते हैं। जिस प्रकार एक घर में एक पिता के नाना विचारों के पुत्र साथ-साथ रहते और विकसित होते हैं, उसी प्रकार सनातन-धर्म में सभी मत-मतांतर सहिष्णुतापूर्वक साथ-साथ विकसित होकर उन्नति करते हैं। सनातन-धर्म की एक अन्य महान् विशेषता यह है कि सनातन-धर्म का मूल अपौरुषेय वेद है जो स्वयं ईश्वर की वाणी है और अधिकांश पंथमत-सम्प्रदाय वेद को प्रमाण मानते भी हैं, किन्तु वेद को प्रमाण न माननेवाले नास्तिक सम्प्रदाय भी सनातन-धर्म के अंतर्गत परिगणित हैं।

यह सदैव से जिज्ञासा का विषय रहा है कि सनातन हिंदू-धर्म के अंतर्गत कौन-कौन से मत-सम्प्रदाय हैं और उनकी ऐतिहासिक, दार्शनिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पृष्ठभूमि क्या है। ‘दी कोर' का प्रस्तुत अंक ‘पंथ-मत-सम्प्रदाय विशेषांक' इसी जिज्ञासा की पूर्ति का एक विनम्र प्रयास है। सनातन-धर्म के अंतर्गत सैकड़ों पंथ, मत-मतांतर और सम्प्रदायउपसम्प्रदाय हैं, जिनमें से प्रत्येक का विवरण देना सम्भव नहीं है, फिर भी हमने कुछ महत्त्वपूर्ण सम्प्रदायों को प्रस्तुत अंक में समेटने का प्रयत्न किया है।

जैन, बौद्ध और सिख-समाज को हमने सनातन-धर्म से बाँटकर नहीं देखा है, अपितु हमारी दृढ़ मान्यता है कि जैन, बौद्ध और सिख-समाज भी सनातन-धर्म की शाखा और उसके अभिन्न अंग हैं। इसी प्रकार प्रस्तुत अंक में हमने जिन-जिन सम्प्रदायों की चर्चा की है, उन-उन सम्प्रदायों के इतिहास, गुरु-परम्परा, ग्रंथ, दर्शन, आचार-पद्धति और उपासनापद्धति का विवरण यथासम्भव उन-उन सम्प्रदायों की मान्यतानुसार ही देने का प्रयास किया है, फिर भी इस कार्य में यदि कोई त्रुटि हुई हो, तो श्रद्धालुजन और विद्वज्जन क्षमा करेंगे।