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ऋषि-कृषि भारतीय आत्मनिर्भरता का चिन्तन
March 1, 2017 • Dr. Shrikrishan Jugnu

हमारे वाङ्मय यह स्पष्ट करते हैं कि भारत में कभी कृषि पर्यावरण की बलि देकर नहीं की गई। खाद्य की सुरक्षा के नाम पर कृषि को विकृत नहीं होने दिया गया। ऋषियों के कृषिशास्त्र यह भली-भाँति हमें बताते हैं। वैदिक काल से ही ऋषियों ने कृषि की सफलता की कामना की और एतद्विषयक सूक्तों की रचना की। ऋषियों ने चाहा कि हल से जोती गई भूमि को इन्द्रदेव उत्तम वर्षा से सींचे और सूर्य अपनी रश्मियों से उसकी रक्षा करें।

कृषि आत्मनिर्भर मानवीय समाज की सूचक है। इसने मानव को सभ्यता का पहला और महत्त्वपूर्ण पाठ पढ़ाया है। इस कार्य को न तो अकारण कहा गया है न ही अनायास, बल्कि नितान्त करणीय और श्रमसाध्य कहा गया है। इसे सभी वर्गों के लिए आवश्यक और अनुसरणीय स्वीकारा गया है। इस कार्य से व्यक्ति व्यर्थ के प्रपञ्च से दूर होकर अपने पाँवों पर खड़ा होने का सामर्थ्य रखता है।

विश्व के सन्दर्भ में कृषि का आरम्भ 9000 ईसापूर्व ही हो गया था, किन्तु मानव-समुदाय में पशुपालन की प्रक्रिया 6000 और 4000 ईसापूर्व के बीच ही आरम्भ हो पाई थी।

वैदिक काल से ही ऋषियों ने कृषि की सफलता की कामना की और एतद्विषयक सूक्तों की रचना की। ऋषियों ने चाहा कि हल से जोती गई भूमि को इन्द्रदेव उत्तम वर्षा से सींचे और सूर्य अपनी रश्मियों से उसकी रक्षा करें

सीरा युञ्जन्ति कवयो युगा वि तन्वते पृथक्। धीरा देवेषु सुम्नयौ॥1॥

इस वैदिक उक्ति का भाव यह है कि आस्थावान् बुद्धिमान लोग विशेष सुखों को प्राप्त करने के लिए भूमि को हल से जोतते हैं और कृषिकार्य करते हैं। (कृषिकार्य न हो तो) वे बैलों के कन्धों पर रखे जानेवाले जुओं को प्रायः उतारकर रखते हैं।

युनक्त सीरा वि युगा तनोत कृते योनौ वपतेह बीजम्। विराजः श्नुष्टिः सभरा असन्नो नेदीय इत्सृण्यः पक्वमा यवन्॥2॥

इस उक्ति में निर्देश है कि जुओं को फैलाकर हलों से जोड़ना चाहिए और फिर भूमि की जुताई करनी चाहिए। सम्यक् रूप से तैयार हो जाने पर उस भूमि में बीजों को बोना चाहिए। इससे अन्न की उपज होगी, खूब धान्य निपजेगा और पक जाने के बाद हमें फल या अन्न मिलेगा।

लाङ्गलं पवीरवत्सुशीमं सोमसत्सरु।उदिद्वपतु गामविं प्रस्थावद् रथवाहनं पीबरीं च प्रफर्म्यम्॥ ३॥

इस उक्ति में कहा गया है कि कृषि-कार्योपयोगी हुल में लोहे का कठोर फाल लगा हो, उसको थामने के लिए लकड़ी की मूठ बनाई जानी चाहिए ताकि हल-प्ररोह के दौरान सहूलियत रहे। यह हल ही है जो गाय-बैल, भेड़-बकरी, घोड़ा-घोड़ी, स्त्री-पुरुषादि के लिए उत्तम घास और धान्यादि उत्पादित करके पुष्ट करता है।

इन्द्रः सीतां नि गृह्णातु तां पूषाभि रक्षतु। सा नः पयस्वती दुहामुत्तरामुत्तरां समाम्॥4॥

इस मन्त्र में यह कामना की गई है कि हल से जोती गई भूमि पर इन्द्र वर्षा द्वारा उचित सिंचाई करें और धान्य के पोषक सूर्य उसकी सुरक्षा करें। यह भूमि हमें सालों साल उत्तम रस से युक्त धान्य उपजाकर प्रदान करती रहे।

शुनं सुफाला वि तुदन्तु भूमिं शुनं कीनाशा अनु यन्तु वाहान्। शुनासीरा हविषा तोशमाना सुपिप्पला ओषधीः कर्तमस्मै॥5॥

किसानों के कर्तव्य को लेकर इस उक्ति में कहा गया है कि वे हल के सुन्दर फाल से भूमि की खुदाई करें। किसान हमेशा बैलों के पीछे ही चलें। हवन-यज्ञादि से प्रसन्न हुए वायु और सूर्य इस कृषिकार्य से श्रेष्ठ फलवाली रसमयी ओषधियाँ प्रदान करें।

शुनं वाहाः शुनं नरः शुनं कृषतु लाङ्गलम्। शुनं वरत्रा बध्यन्तां शुनमष्ट्रामुदिङ्गय॥6॥

कृषिकर्ताओं के लिए यह निर्देश है कि बैल सुखपूर्वक रहें। सभी लोग आनन्दित रहें, उत्तम हल चलाकर आनन्दपूर्वक कृषिकर्म किया जाए। हल-बैलादि में रस्सियाँ जहाँ जिस युक्ति से बाँधी जानी हो, बाँधनी चाहिए और आवश्यकता हो तो चाबुकपराणी को भी उठाना चाहिए।

शुनासीरेह स्म मे जुषेथाम्। यद्दिवि चक्रथुः पयस्तेनेमामुप सिञ्चतम्॥7॥

यह निवेदनात्मक कथन किया गया है कि इस कार्य के निमित्त वायु और सूर्य मेरे हवन को स्वीकारें और जो जल गगनमण्डल में है, उसकी वृष्टि से इस भूमि को सिंचित कर (श्रम को सफल करें)।

सीते वन्दामहे त्वार्वाची सुभगे भव।। यथा नः सुमना असो यथा नः सुफला भुवः॥ 8॥

यह सबके लिए ज्ञातव्य है कि भूमि भाग्य-प्रदायक होती है। इसीलिए हम सब इसका आदर करते हैं। यह भूमि हमें उत्तमोत्तम धान्य प्रदान करती रहे।

घृतेन सीता मधुना समक्ता विश्वैर्देवैरनुमता मरुद्भिः। सा नः सीते पयसाभ्याववृत्स्वोर्जस्वती घृतवत् पिन्वमाना॥9॥ -अथर्ववेद 3, 17, 1-9

कृषिकर्ताओं के लिए यह निर्देश भी है कि जब कृषियोग्य भूमि घी और शहद से योग्य उपाय करते हुए सिंचित होती है और जलवायु आदि देवताओं की अनुकूलता उसको सुलभ होती है, तब वह हम सभी को श्रेष्ठ मधुर, रसयुक्त धान्य और फल प्रदान करती रहे।

हमें यह याद रखना चाहिए कि हुल-आधारित खेती का विकास अर्थव्यवस्था में सुधारात्मक कदम माना जा सकता है। इतिहासकारों ने इसका काल ईसापूर्व 1000-600 निर्धारित किया है। कृषि और उस पर आधारित यज्ञों के लिए भूमि-चयन का आधार जंगलों का सफाया करने के साथ हुआ होगा क्योंकि शतपथब्राह्मण में आता है कि विदेघमाधव सरस्वती नदी के प्रवाह प्रदेश से चलकर जंगलों को जलाते हुए तब तक बढ़ते गये जब तक वह उत्तरी बिहार में सदानीरा या गण्डक नदी तक नहीं पहुँच गये। इस प्रकार इस पूरे ही प्रदेश पर कृषिकर्म और यज्ञ-सत्रों सहित ब्राह्मणावास की बुनियाद रखी गयी। इस काल तक हलों का निर्माण गूलर की लकड़ी से होता था, यह समय 600 ईसा पूर्व का माना गया है जबकि हुल में छह, आठ और बारह से लेकर चौबीस बैल तक जोते जाते थे। इस समय तक कृषिकार्य मुख्य स्रोत के रूप में उभर चुका था। शतपथब्राह्मण में एक पूरा ही अंश (7, 2, 2) खेतों को जोतने के विधि-विधान पर लिखा गया है। वेदों में तन्त्र-मन्त्र के प्रयोग से भी खेती की रक्षा करने का निर्देश किया गया।

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