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इमोशनोमिक्स : आध्यात्मिकता का विज्ञान
November 1, 2017 • L. Karnal Atam Vijay Gupta

 भावनाएँ हमारे अस्तित्व का हिस्सा हैं। भावनाएँ हमारी मित्र हैं, सभी जीवित प्राणियों की मित्र हैं, वे आपके जीवन को खुशियों से भरती हैं। और भावनाएँ दुःख-पीड़ा में भी खुशी ढूँढ़ लेती हैं- पीड़ा की खुशी। भावनात्मनक रूप से खुश व्यक्ति विशिष्ट होते हैं और बहुत बड़ा योगदान देते हैं, जिससे वे हमेशा अनुशासन से काम करते हैं या खुद को जोड़े रखते हैं, अनुशासन विज्ञान, सामाजिक विज्ञान या धातु विज्ञान से संबंधित हो सकता है। पिछली ढाई शताब्दियों से व्यावहारिक विज्ञान में हालिया प्रगति के कारण और धातुविज्ञान को अज्ञानता के ढक्कन से ढक देने से, भक्ति/भावनाएँ/मूल्यों/देखभाल आदि जैसी अवधारणाएँ नेपथ्य में चली गई हैं। हालांकि हम चार मूल प्रेरक तथ्यों में विश्वास करते हैं, जिनके नाम हैं- बचाव, अधिग्रहण, बंधन और मन से उत्पन्न ज्ञान (अस्तित्व की प्रवृत्ति की वजह से हो सकता है), सामाजिक ज़रूरत- ज्ञान के लिए खोज अंतरात्मा से प्रेरित होने का बहुत मजबूत आग्रह प्रतीत होता है- वास्तव में/ सच में प्रेरित होना।

ज्ञान की प्रेरणा का चेतना के साथ बहुत गहरा रिश्ता रहा है, मनुष्य ज्ञान प्राप्त करने की प्रबुद्ध और गहरी चाह रखते हैं। हमारे शास्त्र चेतना के स्तर को विकसित करने, सामान्य चेतना से लौकिक चेतना की ओर बढ़ने पर ध्यान केन्द्रित करते हैं। लौकिक चेतना की प्राप्ति की प्रक्रिया में, जो महत्त्वपूर्ण घटना घटती है, वह है हमारी भावनाओं का भक्ति में प्रकट होना। जिस प्रकार बाजार में, उत्पाद भावनात्मक विशेषताओं के साथ पैक किए जाते हैं, ठीक उसी तरह आध्यात्मिक वायुयान में आपकी भक्ति से अलंकृत प्रार्थनाएँ ईश्वर, लौकिक चेतना के भवसागर द्वारा स्वीकार की जाती हैं।

चेतना, इसीलिए गहरी वैज्ञानिक खोज प्रतीत होती है जहाँ उच्च चेतना की खोज आरंभ करने के लिए भावनाओं-भक्ति- दोनों साधनों की जरूरत पड़ती है। चूंकि वैज्ञानिक खोज शब्द को इस्तेमाल करना चेतना की भाँति सामान्य तौर पर स्वीकार नहीं किया जाता हो, लेकिन वैज्ञानिक शब्द खोज के सन्दर्भ को समझने के उद्देश्य के लिए इस्तेमाल किया जाता है। हम सभी समझते हैं कि खोज शब्द निर्विवाद है; हमारे पञ्चतत्त्व में विलीन होने तक खोज समाप्त नहीं होती है। और मैं वैज्ञानिकता का मतलब तर्कसंगतता की हमारी क्षमता के इस्तेमाल द्वारा खोज करना मानता हूँ। शायद या शायद नहीं, मगर हम सभी समझते हैं कि तर्कसंगतता वहीं पर समाप्त होने लगती हैजहाँ से अंतर्ज्ञान की शुरूआत होती है। हालांकि, यह सत्य है कि चेतना मेरे जैसे आम लोगों- साधारण चेतनावाले लोगों की खोज की विषयवस्तु नहीं है। शायद व्यक्ति में इस तथ्य की चेतना का वास अवश्य रहता है कि चेतना की खोज आत्मा को खोजे बगैर खत्म होगी क्योंकि ‘आत्मा के बगैर’ ‘स्वयं की खोज नहीं की जा सकती है। ऐसा प्रतीत होता है कि स्वयं के लिए खोज उस समय खत्म होगी जब ‘स्वयं को 'स्वयं द्वारा खुद खोजा जाता है।

वास्तविकता और स्वयं के प्रति ईमानदार रहते हुए, शैक्षणिक चर्चा खोज की पद्धति का पता लगाने में मदद नहीं कर सकती; क्योंकि चेतना को खोजना एक अनुभव है न कि कोई अनुमान। चेतना की खोज भक्ति के साथ, लगाव के साथ, अलग रहते हुए भी जुड़ा रहना और जुड़कर भी अलग रहते हुए करनी चाहिए। शैक्षणिक खोज, जिसे हम वर्तमान में विज्ञान, सामाजिकविज्ञान और अन्य विज्ञान के क्षेत्र में करते हैं, वे केवल शैक्षणिक हित के लिए और उन्हें प्रोत्साहित करने के लिए हैं जो ढाँचागत रूप से खोज करना चाहते हैं, जब तक कि वे खोज के उद्देश्य की झलक नहीं पा लेते हैं जो उन्हें विशाल अज्ञात क्षेत्र में भेज सकता है।

यदि वैज्ञानिक साधनों या वैज्ञानिक पद्धति के जरिए चेतना को ढूँढ़ना संभव है, तो विज्ञान को अपनी वर्तमान हठधर्मिता से ऊपर उठना पड़ेगा। हालांकि सभी का इस पर यकीन करना मुश्किल है, लेकिन इसे पूरी तरह से नकारा भी नहीं जा सकता है। जबकि धार्मिक परंपराओं ने दुर्भाग्य से बहुत हठधर्मिता और अंधविश्वास फैला दिया है। या हमने रीति-रिवाजों के पालन में धार्मिक प्रथाओं और दिशाओं को गलत समझा है।

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