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इतिहास-लेखन की आवश्यकता
March 1, 2017 • Abhishek

इतिहास अतीत में या भूतकाल में निहित होता है। पर इतिहास और भूतकाल में अंतर है। वह अंतर है, इतिहास भविष्य के परिप्रेक्ष्य में वर्तमान में भूत की की गई व्याख्या है। ‘भूत’ जो कि निश्चित रूप से बीत चुका है और 'इतिहास' उस बीत चुके हुए जीवन का प्रकाशित अंश है और इतिहास इसी प्रकाशित अंश की व्याख्या एवं तार्किकतापूर्ण, क्रमपूर्ण एवं वैज्ञानिक विवेचन- विश्लेषण है।

अब प्रश्न यह उठता है कि इस इतिहास की आवश्यकता क्या है? इसका कारण है मनुष्य की चेतना का विकास। मनुष्य जैसे-जैसे आगे बढ़ता जाता है, वैसे-वैसे वह अपना जीवन बेहतर से बेहतर बनाना चाहता है। बेहतर बनाने के क्रम में वह सोचता है कि वह किस प्रकार यहाँ तक पहुँचा है और यहाँ तक पहुंचने में उसने किस रास्ते का उपयोग किया है तथा उनमें क्या उचित और क्या अनुचित था। ये हमारे भविष्य को कैसे प्रभावित करते हैं। अतः सुन्दर भविष्य के हेतु एक यूटोपिया का आधार लेकर इतिहास लिखा जाता है।

इतिहासलेखन एक विशेष दृष्टिकोण के साथ भूत की व्याख्या है। हमारे सामने संपूर्ण ‘भूत’ उस तथ्य की तरह है जैसे थैली में भरे आलू की तरह पड़ा हुआ है। इस तथ्य का तार्किक संयोजन ही हमारे इतिहास को अभिव्यक्त करता है।

“History: a true history of something that hap- pened long ago, retold in the present. The past is brought to life once more, and the unequal contact between then and now has been re-established." (History a very short introduction: John H. ArnoldOxford University Press, 2000, p.3,9)

मनुष्य की चेतना के निरंतर विकास के साथ इतिहास के इस पुनस्र्थापना एवं इसकी व्याख्यान की आवश्यकता बनी रहती है। सभ्यता के विकास के साथ नये तथ्य, नये वैज्ञानिक खोज हमारे वर्तमान को बदलता है। इस वर्तमान के बदलाव के कारण अतीत बदल जाता है। वस्तुतः यह अतीत का बदलना नहीं बल्कि तथ्यों के संयोजनात्मक प्रक्रिया में बदलाव होता है। इस संयोजन का आधार इतिहासकार का अपनी दर्शन होती है। इसी दर्शन के आधार पर वह तथ्यों को व्यवस्थित करता है। इस दर्शन काग्रहण उसके चेतना के समाज से जुड़नेवाले स्वरूप पर निर्भर करता है। ग्रहण उसके चेतना के समाज से जुड़नेवाले स्वरूप पर निर्भर करता है।

साहित्य के इतिहास को लिखते समय समाज और उसके चेतना (चित्त) का महत्त्व और बढ़ जाता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने ग्रन्थ ‘हिंदी साहित्य का इतिहास' (1929 ई.) में लिखा है, ‘जबकि प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की जनता की चित्तवृत्ति का सञ्चित प्रतिबिम्ब होता है, तब यह निश्चित है कि जनता की चित्तवृत्ति के परिवर्तन के साथ-साथ साहित्य के स्वरूप में भी परिवर्तन होता चला जाता है। आदि से अंत तक इन्हीं चित्तवृत्तियों की परम्परा को परखते हुए साहित्य-परम्परा के साथ उनका सामञ्जस्य दिखाना ही ‘साहित्य का इतिहास' कहलाता है। (काल विभाग, हिंदी साहित्य का इतिहास, आ. रामचंद्र शुक्ल)।

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