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इतिहास का पन्नों में खो गया टेलीग्राम
October 1, 2017 • Brajkishor Sharma

कभी लाखों लोगों से संवाद का तीव्रतम माध्यम कहलानेवाली टेलीग्राम (तार) सेवा बिना किसी शोर-शराबे के दफन कर दी गयी। अन्तिम टेलीग्राम को संग्रहालय का हिस्सा बनायागया। इस संचार सेवा की शुरूआत वर्ष 1850 में कलकत्ता और डायमंड हार्बर में प्रायोगिक तौर पर की गई थी। ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने 1851 में टेलीग्राफ का उपयोग करना शुरू कर दिया था और 1854 तक देशभर में टेलीग्राफ लाइन बिछाई गई थी। 27 अप्रैल, 1854 को यह सेवा जनता के लिए खेली गयी, जब इस दिन पहला तार बम्बई से पूना भेजा गया था। उन दिनों यह संचार का सशक्त माध्यम था; क्योंकि यह वही दौर था जब हमारा प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम लड़ा जा रहा था। यह सेवा उस दौरान योजक कड़ी थी। कलकत्ता मेडिकल कॉलेज में प्रोफेसर रहे शांगुनसे को भारत में तार का जनक माना जाता है। अलेक्जेंडर ग्राहम बेल (1847-1922) द्वारा 1876 में टेलीफोन का पेटेंट करा लेने के बाद भारत में टेलीग्राफ सेवा का विकास हुआ। 1850 से 1902 तक, तार-सन्देश को केबललाइनों के माध्यम से भेजा गया था, लेकिन 1902 से भारतीय प्रणाली वायरलेस से भेजा जाने लगा।

जब टेलीग्राम की सेवा शुरू हुई थी, तब भारतीयों को इसकी महत्ता का अंदाज़ा नहीं था। लेकिन 1857 के महासमर के दौरान और बाद से लेकर वर्तमान तक तार सामाजिक ताने-बाने का हिस्सा बन गया। टेलीग्राम ने भारत के सभी पहलुओं को छुआ, चाहे वह जन्म, मृत्यु, शादी, नौकरी, बेरोजगारी, युद्ध या कोई दुर्घटना हो। 1857 की क्रान्ति के दौरान तार क्रान्तिकारियों को जोड़े रखने का साधन तथा कम्पनी के लिए आतंक का पर्याय बन गया था। लम्बे समय तक तार और बैरंग पत्र आने का अभिप्राय आतंक था। इस माध्यम की वजह से ही अंग्रेजों के खिलाफ खबरें तीव्रता समाचार-पत्रों के पन्नों पर आने लगीं। यह बात गाहे-बगाहे उठती रही कि यह सुविधा बंद कर दी जाये। मद्रास कूरियर अखबार पर सरकार ने रोक लगाने का प्रयास भी किया था, लेकिन बंगाल असेम्बली की मीटिंग विरोध के कारण इनलैण्ड टेलीग्राम पर रोक नहीं लगाई जा सकी।

वर्ष 1980 का दशक टेलीग्राम के लिए स्वर्णिम दशक कहा जायेगा, जब दिल्ली के मुख्य तारघर में 1 लाख से अधिक टेलीग्राम प्रतिदिन भेजे और मंगाए जाते थे। वर्ष 1980 के दशक में फैक्स मशीन के आगमन ने टेलीग्राम की प्रासंगिकता बढ़ी। लेकिन 1990 की शुरूआत में भारत में डिजिटल संचार और इंटरनेट ने पाँव पसारने शुरू कर दिये।

नब्बे के दशक में भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) ने भारतीय डाक से टेलीग्राम सिस्टम का अधिग्रहण कर लिया। 2011 में बीएसएनएल ने 60 वर्षों के बाद तार सेवा के शुल्क में वृद्धि की। 50 शब्दों के लिए तीन या चार रुपये तक बढ़ाए गये। इस प्रकार 50 शब्दों के एक तारसन्देश भेजने के लिए लगभग 27 रुपये का शुल्क लगने लगा। फिर भी यह सेवा बहुत बड़े घाटे में चल रही थी। 2011 में ऐसी स्थिति थी कि इस सेवा को चालू रखने के लिए सालाना सौ करोड़ रुपये खर्च हो रहे थेऔर आमदनी केवल 75 लाख रुपये थी।

नब्बे के उत्तरार्ध और 2000 के शुरूआती महीनों में टेलीफोनी क्रान्ति ने टेलीग्राम की उपादेयता पर प्रश्न-चिह्न लगा दिया। घर-घर में टेलीफोन कनेक्शन लगाए जाने लगे। टेलीग्राम-सेवा से लगातार गिरते राजस्व के बाद सरकार ने डाक विभाग से सलाह-मशवरे के बाद टेलीग्राम सेवा को बंद करने का फैसला लिया। मानव सभ्यता के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान देनेवाली यह खास संचार-सेवा खास जगह बनाकर 15 जुलाई, 2013 को विदा हो गयी और इतिहास का हिस्सा बन गयी। लेकिन यादों और इतिहास से इसे बेदखल करना सम्भव नहीं है।

ई-मेल, मोबाइल, ह्वाट्सएप की दुनिया में पल-बढ़ रही पीढ़ी इसके ऐतिहासिक मूल्यों को भी शायद भूल जाये, मगर जिस टेलीग्राम ने क्रान्ति के दौरान भारत एकसूत्र में पिरोने में मदद की, वह इतिहास भुलाए जाने योग्य नहीं है।