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आस्तिकता और नास्तिकता के मध्य उलझा युवा
January 1, 2018 • Dr. Varsha Nalme

मालवा हाड़ौती के उद्योगपति घराने सेठ बिनोदीराम बालचन्द के सेठी ग्रुप (कोटा-राजस्थान) के निदेशक अभिनन्दन सेठी बताते हैं कि वर्तमान वातावरण में आस्तिकता का अर्थ ईश्वर की अनन्त सत्ता पर विश्वास करने से है। कोई भी युवा जब इसे आत्मा में ग्रहण करता है, तब वह स्वयं को इसका अंश समझता है और स्वयं को हीन भावना से भी बचाता है। सेठी का मानना है कि इसी के साथ ही वह समाज को ईश्वर का अंश मानकर उसमें एकात्म मानववाद का अनुभव करता हुआ राष्ट्र एवं समाज-समर्पण की भावना जगाने का भी प्रयास करता है। इसमें स्वार्थ एवं वर्ग-संघर्ष से जूझने का मंत्र उसे शक्तिरूप में प्राप्त होता है। आज हमारा युवा यदि युवाओं की समस्याओं को परखे तो वह पायेगा कि वह अधिकाशतः स्वयं में ही आत्महीनता से ग्रस्त है। अतः ऐसी स्थिति में युवा वर्ग को समग्र से स्वयं को जोड़कर कर्मठ होना चाहिये, तभी कार्यनिष्ठा की भावना का संदेश राष्ट्रीयता को बढ़ा पायेगा।

गाजियाबाद, उत्तरप्रदेश की आहारविशेषज्ञा साक्षी बजाज का तर्क है कि आस्तिकता तथा नास्तिकता का सीधा सम्बन्ध आस्था, अनास्था से है और इसी कारण देश के युवा वर्ग की मानसिकता परोक्ष रूप से प्रभावित हुई है। अतः दोनों पहलुओं से अलग युवा को अपने आत्मविश्वास तथा पुरुषार्थ पर भरोसा रखना चाहिए। गीता का कर्म सन्देश हमारे युवा-वर्ग का मार्गदर्शन करता है। साक्षी के अनुसार युवा वर्ग में आज अंधविश्वासी आस्तिकता और दंश दर्शाती नास्तिकता- दोनों ही त्याज्य होना चाहिए। देश के लिये कल्याणकारी आस्थाएँ युवाओं के जीवन का आधार एवं नास्तिकता का नकारात्मक पहलू उनके जीवन को नष्ट भी कर सकता है। अतः दोनों के मध्य स्वविवेक से युवा वर्ग को सामञ्जस्य बिठाना होगा जो जीवन में सफलता की सर्वोच्च कुञ्जी माना जा सकता है। बड़ोदरा, गुजरात के हेमन्त धनञ्जय चौहान बताते हैं किसी भी धर्म, विचारधारा अथवा शास्त्र के प्रति आस्था ही आस्तिकता है।

बड़ोदरा, गुजरात के हेमन्त धनञ्जय चौहान बताते हैं किसी भी धर्म, विचारधारा अथवा शास्त्र के प्रति आस्था ही आस्तिकता है। और इन पर अविश्वास प्रकट करना नास्तिकता है। आस्तिक या नास्तिक होना व्यक्ति या युवा की स्वेच्छा व दृष्टिकोण पर निर्भर करता है, परन्तु इस हेतु किसी को बाध्य नहीं किया जा सकता है। युवा की यह इच्छा परिस्थितिजन्य भी होती है जो सकारात्मक या नकारात्मक परिणाम के साथ परिवर्तित होती रहती है। हेमन्त का मानना है कि युवाओं के मनोभाव स्थिर नहीं होते। वे तो केवल स्वयं को मध्यममार्गीय मानते हैं और यह भाव उनकी मनोभावना व परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

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