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आयुर्वेद में नवाचार की आवश्यकता
June 1, 2017 • E. Hemant Kumar

कहने को तो इन्सान सर्वाधिक विकसित व बुद्धिमान प्राणी है, परन्तु वह आदिकाल से ही सबसे ज्यादा रोगग्रस्त रहा है। स्वस्थ रहने के लिए मनुष्य की विभिन्न सभ्यताओं में रोगनिदान पद्धति तथा औषधियाँ विकसित हुई हैं। विश्व में करीब 5-8 बृहत् तथा सुस्पष्ट चिकित्सा-प्रणाली तथा हजारों नुस्खे मौजूद हैं। परन्तु इन्सान के रोग बढ़ते ही जा रहे हैं। ‘जैसे-जैसे दवा का मर्ज बढ़ता गया' यह रोगी विशेष के साथ-साथ पूरी मानव सभ्यता पर भी सटीक बैठता है। मृत्यु के समय सबसे ज्यादा कष्टमय तथा अशान्त रहनेवाला भी मनुष्य ही रहा है।

लोगों को रोगमुक्त तथा स्वस्थ रखने के गम्भीर प्रयास हमारे देश में प्राचीन काल से ही होने लगे थे। जैव विविधता से भरपूर भारत में पेड़-पौधों का प्रयोग रोगनिदान में करना, आदिकाल के विज्ञान का प्रिय विषय रहा है। पुराने चिकित्सकों ने देशज वनस्पतियों पर गहन एवं विस्तृत अध्यन कर भोजन एवं रोग निदान में इनकी उपयोगिता ज्ञात की, जो कालान्तर में विकसित होकर आयुर्वेद चिकित्सा प्रणाली के रूप में जानी गयी। निरोग रहने के लिए दिनचर्या तथा खान-पान कैसा हो, आहार को औषधी कैसे बनाएँ, “आयु में वृद्धि तथा वृद्धावस्था में भी निरोगी कैसे रहा जाए'– इन विषयों पर भी आयुर्वेद ने बेहतरीन निष्कर्ष निकाले

आयुर्वेद 900-1000 ईसवी तक भारत में एकमात्र मुख्य रोगनिदान-प्रणाली रही है। अरबों तथा मुगलों के साथ यूनानी और यूरोपवासियों के साथ ऐलोपैथी तथा होमियोपैथी का आगमन तथा प्रचलन देश में हुआ।

। वर्तमान में एलोपैथी, अनेकानेक विशेषताओं के कारण अत्यन्त लोकप्रिय चिकित्सा-प्रणाली बन गई है। रोग का त्वरित शमन होना, आपातकालीन तथा शल्य-चिकित्सा में अद्वितीय होना, नित नये उपकरण तथा अधिक विकसित तकनीक आना एलोपैथी की विशेषताएँ हैं, परन्तु अनेक कारणों से विशाल जनसमूह देशी- जड़ी बूटियों से ही इलाज़ करना पसन्द करता है। इस कारण आज समय की मांग है कि आयुर्वेद को भी आधुनिक तकनीकों से युक्त तथा शोधपरक बनाया जाए। ऐसा करने से त्वरित निदान करनेवाली औषधियों का विकास हो सकेगा तथा आधुनिक दवाओं के दुष्प्रभाव से बचा जा सकेगा।

आयुर्वेद में रोगनिदान-पद्धति का विकास विभिन्न औषधियों का मानव पर परीक्षण सिद्ध करके हुआ है। इस परिपाटी के कम-से-कम दो से तीन हजार साल पुरानी होने का अनुमान है। उस समय की जलवायु तुलनात्मक रूप से अधिक स्वच्छ तथा स्वस्थकारी थी। लोगों का खान-पान तथा रहन-सहन प्रकृति के नजदीक था। आज लोगों की दिनचर्या तथा खानपान- दोनों बदल गए हैं। इसके साथ जलवायु (आद्रता, तापमान, वर्षा, जल की प्रकृति, विभिन्न मौसमों की समय आदि) में बड़ा बदलाव आया है।

इसलिए उस समय हुए परीक्षणों को अद्यतन करने की आवश्यकता है। साथ ही नवीन तकनीकों के साथ तालमेल बैठाने की भी परम आवश्यकता है, ताकि इस प्रणाली की लोकप्रियता-उपयोगिता भविष्य में बढ़ सके। इस सन्र्दभ में अग्रवर्णित निष्कर्षों को शोध तथा विकास करके प्राप्त करना होगाः

1. वात, पित्त, कफ को रासायनिक परीक्षणों द्वारा अंकों में मापने की विधि का विकास करना।

2. वात, पित्त, कफ के अलावा इस काल में पैदा हुए अन्य रोगजनक तत्त्वों की खोज करना (यदि हुआ हो तो)

3. वर्तमान में उपलब्ध वनस्पतियों एवं अनाजों के मनुष्य के शरीर पर पड़नेवाले प्रभावों का पुनः अध्ययन करना एवं रोगनिदान में उनकी उपयोगिता तलाशना।

4. नाड़ी की गति/चाल द्वारा रोग जानने के लिए मशीनों का विकास करना; क्योंकि मनुष्यकृत रोग आकलन में व्यक्तिगत दक्षता तथा अनुभव प्रभावी कारक होता है।

5. ज्यादातर रोगों के लिए देशभर में सैकड़ों नुस्खे प्रयोग लाए जाते हैं।इनको अखिल भारतीय स्तर पर एकत्र किया जाए। तथा इनकी रोग शमन शक्ति का व्यापक परीक्षण एवं सिद्धिकरण कर वरीयता/ प्रभावशीलता/ ताकत के क्रम में प्रकाशित कराया जाए, क्योंकि इन अध्ययनों के अभाव में रोग की तीव्र अवस्था में भी अज्ञानतावश कम प्रभाव की औषधि का प्रयोग किया जाता रहता है। फलस्वरूप रोग लाइलाज हो जाता है।

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