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आध्यात्मिक भारत (मिस्टिक इण्डिया)
February 1, 2017 • Prafful Chandra Thakur

अठारहवीं शती के महान् आध्यात्मिक युगपुरुष स्वामी नारायण पर केन्द्रित फिल्म ‘अध्यात्मिक भारत' का निर्माण बोचासणवासी अक्षर पुरुषोत्तम स्वामी नारायण संस्था द्वारा किया गया है। स्वामीनारायण (1781-1830) का मूल नाम नीलकण्ठ था और बाद में वह भगवान् श्री स्वामीनारायण के नाम से विख्यात हुए। इस फिल्म की कहानी ग्यारह वर्षीय योगी बालक नीलकण्ठ द्वारा सात वर्षों में की गई बारह हजार किलोमीटर की पैदल यात्रा को समेटे हुए है। दिल्ली के अक्षरधाम मन्दिर में इस फिल्म को दिखाया जाता है।

अठारहवीं शती के महान् आध्यात्मिक युगपुरुष स्वामी नारायण पर केन्द्रित फिल्म ‘अध्यात्मिक भारत' (अंग्रेजी में 'मिस्टिक इण्डिया') का निर्माण बोचासणवासी अक्षर पुरुषोत्तम स्वामी नारायण संस्था द्वारा किया गया है। यह फिल्म एकसाथ हिंदी, अंग्रेजी, फ्रेंच एवं स्पेनिश भाषाओं में बनाई गई है। स्वामीनारायण (1781- 1830) का मूल नाम नीलकण्ठ था और बाद में वह भगवान् श्री स्वामीनारायण के नाम से विख्यात हुए। स्वामीनारायण अपने व्यक्तित्व और कर्तृत्व के बल पर दो शताब्दियों से अधिक समय से आध्यात्मिक क्षेत्र में प्रेरणास्रोत बने हुए हैं। इस फिल्म की कहानी ग्यारह वर्षीय योगी बालक नीलकण्ठ द्वारा दिनांक 29 जून, 1792 से 21 जुलाई 1799 तक सात वर्षों में की गई बारह हजार किलोमीटर की पैदल यात्रा को समेटे हुए है। यह यात्रा एकांतिक धर्म की स्थापना के लिए थी।

भारत पूरे विश्व में एक अनूठा राष्ट्र है। यह अपने अद्भुत आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत के लिए सुविख्यात है। यह राष्ट्र विविधताओं से भरा हुआ है। यहाँ के रंग-बिरंगे रीति-रिवाज और उत्सव लोक-लुभावन हैं। यहाँ की असाधारण बातें दुनिया के लोगों को आकर्षित करती रही हैं। भारत ने विगत हजारों वर्षों से जीवन के गूढ़ रहस्यों की खोज की है जो भौतिक दुनिया से परे है। योगी बालक नीलकण्ठ ने जीवन को प्रेम एवं शान्ति से जीने, जीवन से परे मृत्यु को समझने और प्राणिमात्र के कल्याण के लिए कार्य करने के लिए अपनी आध्यात्मिक शक्ति के बल पर ऐसी अद्भुत, दुर्गम तथा अकल्पनीय यात्रा की। यह ऐसा यात्रा थी जिसके बारे में जानकर लोगों के जीवन में परिवर्तन आयेगा, उनका मन प्रेम एवं आदर-भाव से भर जायेगा। इस कारण बालयोगी ने जाना- पहचाना रास्ता छोड़कर ऐसा दुर्गम रास्ता चुना जहाँ कोई पीछा न कर सके। सरयू नदी की खतरनाक उफनती धारा में प्रवेश कर जीवित निकलना साहसिक था। नदी से जीवित निकलने पर नीलकण्ठ का निश्चय दृढ़ और संकल्प मजबूत हुआ। इसके बाद उन्होंने पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण दिशाओं में विविधतापूर्ण दुर्गम यात्राएँ कीं। उत्तर में हिमालय पर्वत श्रृंखला के बीचवाले क्षेत्र में पहुँचना, योग-साधना एवं तप करना विलक्षण है। 29 हजार फीट की ऊँचाईवाले एवरेस्ट पर्वत, कैलास का दर्शन, मानसरोवर तक जाना, नेपाल के अन्नपूर्णा । क्षेत्र से 22 हजार फीट की गहरी खाई से गुजरना अद्भुत है। एक तरफ तपते रेगिस्तान की कठिन यात्रा तो दूसरी तरफ पूर्वी भारत के भयानक वर्षावाले क्षेत्र चेरापूँजी, सुन्दरवन और जगन्नाथपुरी की यात्रा।

इस फिल्म में भारत की विविधतापूर्ण विशिष्टताओं को सुन्दर ढंग से दर्शाया गया है। एक सौ तीस करोड़ की आबादी, अठारह विभिन्न भाषाओं, सोलह सौ से ज्यादा बोलियोंवाले देश में जीवन का सही कर्म प्रेम की मूक भाषा में है, शब्दों में नहीं। योगी बालक नीलकण्ठ ने नेपाल में पर्वत पर एक पैर पर खड़े होकर कठिनतम तप किया। शून्य से 40 डिग्री नीचे तापमान के बीच 4 मास तक खुले शरीर में बर्फीली हवाओं के झोंके के बीच रहकर ध्यान करना और सकुशल जीवित रहना आज तक रहस्य बना हुआ है। यह घटना आज के वैज्ञानिकों के समक्ष चुनौती बनी हुई है। नीलकण्ठ ने मुक्तिनाथ में, जहाँ से 108 पवित्र जलधाराएँ बहती हैं, ध्यानमग्न निश्चल मुद्रा में कठिनतम तप किया। यह मुद्रा मन और शरीर से परे मानी जाती है। हिमालय पर्वत साधकों के लिए आध्यात्मिक पिता-सदृश है। हिमालय की यात्रा के बाद नीलकण्ठ पूर्व दिशा में चले। असम और बंगाल के रास्ते उड़ीसा की जगन्नाथपुरी पहुँचकर उन्होंने ढाई हजार वर्ष पुराने रथयात्राउत्सव में भाग लिया। इस उत्सव में ढ़ाई लाख यात्री आए थे। उन्होंने आध्यात्मिक आनन्द के उत्सव का रसपान किया। देश में नये साल का उत्सव अन्नकूट-उत्सव, प्रकाश-पर्व दीपावली, रंगों का त्योहार होली सहित कई पर्व-त्योहार तथा चरम आनन्द और हर्षोल्लास के उत्सव मनाए जाते हैं। इसके बाद भ्रमण करते हुए वह केरल पहुँचे। रामेश्वरम् की यात्रा कर वह शास्त्रीय नृत्य-संगीत की विशेषताओं से परिचित हुए। अपनी यात्रा के सातवें वर्ष में वह गुजरात पहुँचे। गुजरात के लोज गाँव में शान्तिमय-भक्तिमय जीवन के बीच स्थित रामानन्द आश्रम में नीलकण्ठ के पहुँचने पर उनको रामानन्दजी की अनुपस्थिति तक रहने का अनुरोध किया गया। नीलकण्ठ वहाँ रुककर आश्रमवासियों को अष्टांग योग बताते रहे। रामानन्दजी से भेंट होने पर योगी नीलकण्ठ का जीवन बदला। रामानन्दजी बालयोगी नीलकण्ठ की अपने यहाँ आने की प्रतीक्षा वर्षों से कर ही रहे थे।

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