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आधुनिक वंशविज्ञान और डीएनए
December 1, 2017 • E. Hemant Kumar

मनुष्य अपने पूर्वजों के बारे में जानने के लिए सदैव उत्सुक रहता है, उसकी प्रबल इच्छा रहती है, कि उसके पूर्वजों में से कोई बड़े नामवाला या महाप्रतापी निकल आये और उसे किसी महापुरुष का वंशज होने या बड़े घराने में जन्म लेने का गौरव प्राप्त हो जाय। इतिहासलेखन, ऐतिहासिक सम्पत्तियों के वारिसाना हक के निर्धारण, पैतृक सम्पत्ति में न्यायपूर्ण हिस्सेदारी, विवाह तय करते समय वंश एवं गोत्र का मिलान, अनुवांशिक रोगों की जड़ तक पहुँचने, हिंदुओं में पितृ- तर्पण/श्राद्ध एवं पूर्वजों की जानकारी रखने की हमारी बाल-सुलभ अभिलाषा की पूर्ति हेतु पूर्वजों का अच्छा ब्यौरा अर्थात् वंशावली का ज्ञान होना बहुत जरूरी है। पूर्वजों की जानकारी रखना ग्रामीण क्षेत्रों में बुद्धिमानी का प्रतीक भी माना जाता है; तभी तो किसी वाचाल को चुप करने के लिए उससे पूछ लिया जाता है कि बताओ तुम्हारे दादा के दादा के पड़दादा का क्या नाम है? वंशावली एवं कुल सम्बंधी आँकड़ों को, पारम्परिक तथा आधुनिक दो विधियों रखा जा सकता है।

(1) वंश-लेखन की भारतीय पारम्परिक प्रणाली

भारत में वंशावली का निर्माण तथा रखरखाव मुख्यतः चार-पाँच तरीकों से होता रहा है- राजाओं, उच्च कुलीन तथा साधन सम्पन्न लोगों की वंशावली भाट, राव आदि द्वारा, जन-सामान्य की गया (बिहार) में श्राद्ध/तर्पण करानेवाले सम्बन्धित पुरोहित द्वारा, अस्थि-विसर्जन करानेवाले पुरोहित द्वारा; सनातन धर्मग्रन्थों में तथा काशी, बद्रीनाथ, हरिद्वार, द्वारका, जगन्नाथपुरी, आदि बड़े तीर्थों में दान-दक्षिणा के सन्दर्भ में पुरोहितों द्वारा।

(2) आधुनिक वंश-विज्ञान

आधुनिक वंश-विज्ञान मानव के विकास- क्रम पर आधारित है; जो यह मानता है कि मानव का विकास लगभग 4 लाख वर्ष पहले चिपैंजी से शुरू हुआ था। विकास के इस क्रम में प्रथम विकसित मानव लगभग 4 से 1.5 लाख वर्ष पूर्व, काल के बीच, दक्षिण अफ्रीका में हुआ था तथा उसकी पीढ़ियाँ वहाँ से लगभग 60 हजार साल पहले विचरण करती हुई विश्व के अन्यहिस्सों में पहुँची। लाखों वर्षों में जलवायु, क्षेत्रीय परिस्थितियों तथा जीवन-संघर्ष के कारण इनकी कद-काठी, रूप-रंग तथा बौद्धिक विकास में अन्तर हो गया, जिसके कारण आज विश्वभर में अलग-अलग रंग- रूप, कद-काठी तथा बौद्धिक क्षमताओंवाली मानव-जातियाँ मौजूद हैं। वैश्विक विस्थापन के कारण दुनियाभर में संकर वर्ण के लोग बड़ी संख्या में मिलते हैं। इस वर्ग के लोगों की पहचान, पारम्परिक वंश-लेखन के लिए हमेशा चुनौती रही है, क्योंकि इनके गोत्र निर्धारण अत्यन्त दुरूह होता है। आधुनिक वंश-विज्ञान खून के रिश्तेदारों के डी.एन.के परीक्षण के आधार पर गोत्र या उपजाति तय करता है।

आधुनिक वंश-विज्ञानका मूल आधार: डीएनए-तकनीक

मनुष्य अन्य जीवों से इसलिए भी विशिष्ट माना जाता है; क्योंकि वह प्रश्न पर प्रश्न खड़े करता है। उसके द्वारा आज तक अनेक विषयों पर, हजारों-लाखों प्रश्न किये जा चुके होंगे। इनमें अति-सहज एवं प्रायः सुनने को मिलनेवाले कुछ ऐसे प्रश्नों की बानगी देखिये जो सीधे अनुवांशिकी तथा वंशावली के विषय से जुड़े हैं

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