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आधुनिक नाटीवाद : मार्क्सवादी प्रभाव और भारतीय चिन्तन
June 20, 2019 • शोभा जैन

आधुनिक समय में स्त्री के प्रश्न हाशिए के नहीं बल्कि जीवन के केंद्रीय प्रश्न हैं। जिनमें नारीवाद एक ऐसा दर्शन है, जिसका उद्देश्य है- समाज में महिलाओं की विशेष स्थिति के कारणों का पता लगाना और उनकी बेहतरी के लिए वैकल्पिक समाधान प्रस्तुत करना। समाजवादी नारीवादियों ने न केवल महिलाओं की गुलामी के उदय के- एंगेल्स के विश्लेषण को अपनाया, बल्कि माक्र्सवादी धारणाओं को लागू कर महिलाओं के शोषण चक्र को भी समझने का प्रयास किया

गिल्स की पुस्तक- 'दि ओरिजन ऑफ दि फेमिली प्राइवेट प्रापर्टी एन्ड दि स्टेट के अनुसार सृष्टि के प्रारम्भ से ही पुरुष सत्ता स्त्री की चेतना और उसकी गति को बाधित करती रही है। दरअसल सारा विधान ही इसी से निमित्त बनाया गया है, इतिहास गवाह है सारे विश्व में पुरुषतंत्रा, स्त्री अस्मिता और उसकी स्वायत्तता को नृशंसता पूर्वक कुचलता आया है। उसकी शारीरिक सबलता के साथ-साथ न्याय, धर्म, समाज जैसी संस्थायें पुरुष के निजी हितों की रक्षा करती है और स्त्री को कमजोर और हीन साबित करती हैं। ज्ञातव्य है कि उक्त पुस्तक एंगल्स और मार्क्स के नोट्स द्वारा तैयार की गई थी अब जबकि स्त्री केवल गृहस्थी के यज्ञ अग्नि की देवी नहीं नव उदारवाद के बाद भारतीय समाज में महिलाओं के प्रति आए बदलाव जानना अब और भी जरूरी हो गया है क्योकि समाज के दोहरे मापदण्ड आज भी उसे स्वतंत्र बुद्धि के आग्रह से रोकते है। आधुनिक समय में स्त्री के प्रश्न हाशिए के नहीं बल्कि जीवन के केंद्रीय प्रश्न हैं। जिनमें नारीवाद एक ऐसा दर्शन है, जिसका उद्देश्य है- समाज में महिलाओं की विशेष स्थिति के कारणों का पता लगाना और उनकी बेहतरी के लिए वैकल्पिक समाधान प्रस्तुत करना। समाजवादी नारीवादियों ने न केवल महिलाओं की गुलामी के उदय के- एंगेल्स के विश्लेषण को अपनाया, बल्कि मार्क्सवादी धारणाओं को लागू कर महिलाओं के शोषण चक्र को भी समझने का प्रयास किया। ये नारीवादी, महिलाओं के उन मौजूदा विश्वासों और प्रवृत्तियों का महिमंडन नहीं करते, जिन पर पितृसत्ता विचारधारा का वर्चस्व होता है और जो महत्त्वपूर्ण तरीके से रोजमर्रा के जीवन के पितृसत्तात्मक ढांचे से प्रभावित होते हैंइस प्रकार माना जाता रहा है कि मार्क्सवाद और नारीवाद को मिला कर ही समाजवादी नारीवाद की विचारधारा विकसित हुई है। प्रभा खेतान ने नारीवादी के सदर्भ में कहास्त्री के निजी जीवन को समझना उसकी मनोवैज्ञानिक समस्याओं और सांस्कृतिक समस्याओं को सुलझाना ताकि वह चुनाव की सम्भावनाओं से वंचित न रह सके नारीवाद हैदरअसल इस अवधारणा की पृष्ठभूमि यह की स्त्री की सामाजिक स्थिति के केन्द्र में अब तक उसकी दैहिक संरचना ही है। उसकी दैहिकता को शील, चरित्रा और नैतिकता के साथ जोड़ा गया अक्सर स्त्री को देह के आस-पास ही परिभाषित किया जाता रहा है । चाहे वह साहित्य का नख-शिख वर्णन हो, चाहे वात्सायन का नायिका भेद, स्त्री को विवेकशीलता के साथ शायद आज भी उस स्तर पर आँका ही नहीं गया योवन और सौन्दर्य के अतिरिक्त उसकी अपनी समझ और बुद्धि का मूल्यांकन उस स्तर तक नहीं हुआ जितना वर्णन उसकी शारीरिक विषयों पर हुओ जब भी स्त्री रचनाकार दर्द बखानने के लिए कलम चलाती है तो उसे उसके दूरगामी परिणाम भोगने पड़ते है। ऐसा क्यों होता है कि जब कोई स्त्री रचनाकार वैयक्तिक अनुभवों की अभिव्यक्ति का जोखिम उठाती है जिसमें समाज का आईना निहित होता है तो कहानी की नायिका को रचनाकार से जोड़कर देखा जाता है? स्त्री रचनाकार अपनी निजता को दांव पर लगाकर समाज के उलाहनों का शिकार क्यो बनती है? आज भी उसके स्वतंत्र अस्तित्व को स्वीकारा नहीं जाता। नारीवादी की बुनियादी चिंता स्त्री मुक्ति है स्त्री मुक्ति के प्रयासों को समग्र, सामाजिक आर्थिक, और राजनीतिक रूपांतरण में बदलना सम्पूर्ण आधुनिक नारीवाद है। जबकि आज नारीवाद एक अकादमिक विषय बनकर रह गया है। भारतीय चिन्तन के संदर्भ में जब भी समाज और नारीवाद की बात होती है, डॉ. भीमराव आंबेडकर का योगदान अविस्मरणीय माना जाता है, भारतीय संदर्भ में देखा जाय तो अंबेडकर संभवतः पहले अध्येता रहे हैं, जिन्होंने जातीय संरचना में महिलाओं की स्थिति को जेंडर की दृष्टि से समझने की कोशिश की। यह वह समय था जब, यूरोप के कई देशों में प्रथम लहर का महिला आंदोलन अपनी गति पकड़ चुका था उनके चिंतन का केंद्र महिलाएं भी थीं क्योंकि भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति बहुत ही चिंतनीय थी। पुरुष वर्चस्व की निरंतरता को कायम रखने के लिए महिलाओं का धार्मिक और सांस्कृतिक आडंबरों के आधार पर शोषण किया जा रहा था। 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में समाज सुधार आंदोलन हुए जिनका मुख्य उद्देश्य महिलाओं से जुड़ी तमाम सामाजिक कुरीतियों को दूर करना था। भारतीय नारीवादी चिंतन और अंबेडकर के महिला चिंतन की वैचारिकी का केंद्र ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक व्यवस्था और समाज में व्याप्त परंपरागत धार्मिक एवं सांस्कृतिक मान्यताएं ही थीं जो महिलाओं को पुरुषों के आधीन बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करती रही हैं। इस प्रकार हम देखते हैं हिंदी साहित्य में भी पिछले पचास वर्षों के अनेक नए आंदोलनों नई धुरी के रूप में नारीवाद विमर्श महत्पवूर्ण रहा। यह भी माना जाता रहा जिस समय समाज में मार्क्सवाद का प्रभाव था यह विषय तेजी से विकसित हुआ। इसलिए इसके विषय में यह अवधारणा रही है कि नारीवाद' मूलतः पश्चिम की देन है किन्तु पश्चिम से आने मात्र से इसे खारिज तो नहीं किया जा सकता आधुनिक नारीवाद के विकास का पहला मील का पत्थर 1949 में प्रकाशित सिमोद-द-बोउवार की फ्रेंच कृति- 'द सेकेण्ड सेक्स' को माना जाता है। इसका अंग्रेजी अनुवाद 1953 में आया यह पुस्तक महिला आन्दोलन की आधारभूमि बनी। 19 वीं शताब्दी में स्त्री विमर्श केन्द्रित पुर्णतः माक्र्सवादी दृष्टिकोण से लिखी कृति (बेबेल की नारी और समाजवाद 1879) आई उन्होंने मार्क्स और एंगिल्स के सिद्दांतों का प्रतिपादन करते हुए लिखा- स्त्री मुक्ति की दिशा में मजदूरों में वर्ग चेतना जगाई जाय और राजनितिक जीवन में उनकी भागीदारी बढाई जाय। वही स्त्री की मूक कुंठा को स्वर बद्ध करने में बेटट्टी फ्रीडन का खास योगदान रहा उनकी पुस्तक- 'फैमिनिन मिस्टिक' ने समाज को यह स्वीकार ने पर मजबूर किया- साधन सम्पन्न मध्यमवर्गीय श्वेत स्त्रियाँ भी जो सुखी और संतुष्ट दिखती है अंदर से निराश और कुंठित हैं। साठ के दशक में पश्चिम दुनियाँ में पुरुष वर्चस्ववादी सामाजिक सत्ता और संस्कृति के विरुद्ध जो आवाज उठाई गई उस प्रबल आन्दोलन को नारीवाद की संज्ञा दी गईइस संदर्भ में भारतीय चिन्तन की दृष्टी से अनामिका ने अपनी पुस्तक 'स्त्रीत्व का मानचित्र' में लिखा है स्त्रीवादी आन्दोलन धनी महिलाओं के विलास भर नहीं है। नारीवाद को बार बार परिभाषित करने की चेष्टा की जाती है कुछ विचारकों के अनुसार केवल पश्चिम नारीवाद के बजाय भारतीय नारीवाद पर जोर देना चाहिए। इस बिना तर्क के विचार से जो नई चीज जन्मेगी वह यह की नारीवाद को अलग-अलग खेमों में बाँट देने का उद्मम रचा जायेगा हिन्दू और मुसलमान, अमीरगरीब, दलित स्वर्ण, इन विकल्पों में नारीवाद के मूल से भटकते हुए स्त्री की छवि, उसके हस्ताक्षर पर बात कम होगी और यह विषय धूमिल हो जायेगा। दरअसल आधुनिक नारीवाद के विमर्श में यह जानना नितांत आवश्यक है की नारीवाद की जमीन क्या है? क्या यह पश्चिम का प्रभाव है जिससे भारतीय महिलाओं को बचना चाहिए? हम देखते हैं। भारतीय दृष्टी में आज भी पढ़ी लिखी शहरी स्त्रियाँ फेमिनिज्म शब्द से कतराती है। इसके जवाब में उनका कथन होता है कि मैं नारीवाद तो नहीं पर स्त्री के खिलाफ नहीं। यहाँ एक बात स्पष्ट कर देनाआवश्यक है की नारीवादी जो एक व्यापक आन्दोलन है इसकी आधुनिक समय में यही अपेक्षा है की स्त्रियोचित सोच और लगाव का सम्मान करें उसे स्वीकार करें। तब क्या फर्क पड़ता है की आप स्वयं को नारीवाद कहें या न कहें। जो लोग यह समझते है की स्त्री स्वाधीनता की विचारधारा सत्तर के दशक में फ्रांस और अमेरिका से भारत आई उन्हें यह जानकर आश्चर्य होगा की महादेवी वर्मा की श्रृंखला की कड़ियाँ १९४२ में छपी थी उसके अधिकांश निबंध तीस के दशक की में प्रसिद्ध पत्रिका चाँद के लेखों में प्रकाशित हुए थे। इस समय नारीवादी सोच को आंदोलित करने वाली सिमोद-द-बोउवार की फ्रेंच कृति- 'द सेकेण्ड सेक्स अस्तित्व में नहीं थी। यह मूलतः भारतीय दृष्टिकोण है न की पश्चिम की देन ईश्वर चन्द विद्यासागर, राजा राममोहन राय ने स्त्री के जीने का अधिकार पर प्रश्न उठाते हुए सती प्रथा का विरोध किया। भारतीय नवजागरण के दौरान स्त्री की स्वाधीनता का प्रश्न मुखरता से सामने आया। 1882 क्रांतिकारी महिला ताराबाई शिंदे की पुस्तक स्त्री-पुरुष तुलना इसी श्रृंखला की एक कड़ी है। भारतीय चिन्तन में महर्षि दयानंद सरस्वती के द्वारा की गई आर्य समाज की स्थापना स्त्री अधिकारों की  एक महत्वपूर्ण कड़ी है। इस प्रकार नारीवाद को लेकर भले ही अवधारणाएँ पाश्चात्य प्रभाव की हो अथवा भारतीय चिन्तन की किन्तु आजादी के बाद से अब तक भारतीय समाज में स्त्री शिक्षा, संवेधानिक अधिकारों, नोकरियों के कारण आर्थिक स्वतंत्रता निरंतर बदलते समाज और बदलती नैतिक मान्यताओं पर व्यापक स्तर पर नारीवाद आन्दोलन का प्रभाव है। हम देखते है आधुनिक समय में शिक्षित और स्वावलंबी स्त्रियों ने अपने लिए निर्णय लेने की पहल की है। पुरुष वर्चस्व के बावजूद परिवार में स्त्रियों का प्रतिरोध मुखर होने लगा है क्योकि यह केवल एक विचारधारा नहीं है अपितु इसका सम्बन्ध स्त्री के मानसिक, शारीरिक, आर्थिक संघर्ष से है। यह पुरुषों के खिलाफ उन्हें प्रोत्साहित करने का दर्शन नहीं, न ही समाज में उन्हें अलग हटकर देखने का आग्रह है। यह एक समग्र दृष्टिकोण है जो शोषित और प्रवंचित नारी की स्थितियों के प्रति समाज के संवेदनशील नागरिकों में  मानवीय और सहानुभूति पूर्ण दृष्टिकोण विकसित कर सके। उनके प्रति अपने कर्मठ दायित्वबोध के प्रति जाग्रत कर सके। प्रायः देखा जाता रहा है हिंदी के साहित्यिक परिदृश्य में भी बुद्धिजीवी वर्ग  अभी भी स्त्री के बारे में सही परिप्रेक्ष्य में मुक्तकामी लक्ष्य से सोच विकसित नहीं कर पा रहा। इसके अनेक उदाहरण स्त्री लेखन में देखने को मिलते है जब भी स्त्री स्वयं को अपने लेखन के माध्यम से बोद्धिक सौन्दर्य के समक्ष उपस्थित करने के प्रयास करती है तो उसे उनके निजी जीवन के कमजोर दौर के अनुभवों में आँका जाता है। जबकि पुरुष जब भी स्त्री यातना पर लिखता है हम दर्द बनकर, स्त्री को विषय बनाकर उसकी पीड़ा का अनुमान भर लगाता है। स्त्री रचनाकार अपनी निजता को दांव पर लगाकर समाज के उलाहनों का शिकार ही बनती है यह नारीवादी विमर्श का महवपूर्ण पहलू है। एक स्त्री लेखक को पहचानते समय पुरुषों के साथ उसके सम्बन्धों में बात करना उसके परिचय का हिस्सा ही रहा फिर चाहे वो सम्बन्ध पत्नी के रूप में हो पुत्री या प्रेमिका उसका अपना स्वतंत्र अस्तित्व स्वीकार ने की हिम्मत कोई नहीं जुटा पायो गार्सा ३ तासी अकेले इतिहासकार हैं जो इन मामलों में सजग हैं। जो इतिहास लेखन में स्त्री की जरूरत को रेखांकित कर जाते हैं।

जाते हैं। समग्रतः कहें तो आज जबकि नर्सिंग टीचिंग जैसे पारंपरिक करिअर विकल्पों के बजाय स्त्री एडवेंचिस्ट है जमाने भर की हसरतों को पूरा करने के बजाय खुद की ख्वाहिशों को पूरा करने की नई दौर की औरत है, रसोई से खेत की मुट्ठी भर जमीन लांघकर स्पेस मिसाईल और टेक्नोलॉजी से खेलने वाली 21 वीं सदी की नारी है बावजूद इसके समाज के दोहरे मापदंड से वो आज भी अभिशप्त है उसे देह विमर्श में समेटकर देह के धरातल से मुक्त करने की चुनोती अभी शेष है। निः संदेह आधुनिक नारी ने 21 वीं सदी के वैश्विक पटल पर अपनी पहचान बनाई जिनसे कई पुरानी जर्जर मान्यतायें टूटी, जिससे पुराने शब्द पर नए अर्थ की कलम चली। स्त्री घर के बाहर तो निकल चुकी है किन्तु आधुनिक समाज की दोहरी मानसिकता के चक्रव्यूह में फंसी स्वयं यह नहीं समझ पा रही है की वह उपभोक्ता बाजार को निर्देशित नहीं कर रही है बल्कि जो मनचाहा उसे परोसा जा रहा है उसे भोगने को बाध्य है।