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आई आई टी गंगा किनारे वाली
August 1, 2017 • Dr Ravindra Aggarwal

‘गंगा एक्शन प्लान से लेकर नमामी गंगे' तक चल रहे गंगा माई के शुद्धिकरण- अभियान का लेखा-जोखा बहुत ही हृदयविदारक है। अप्रैल 1986 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने गंगा माई को प्रदूषण से मुक्त कराने के लिए महत्त्वाकांक्षी ‘गंगा एक्शन प्लान की घोषणा की थी। इस प्लान के तहत गंगा कितनी साफ़ हुई, इसका सहज अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस प्लान के पूरे 28 वर्ष बाद मई 2014 में जब नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बने, तो वाराणसी में गंगा की दुर्दशा देखकर उन्होंने ‘नमामी गंगे' अभियान प्रारम्भ कर गंगा माई को प्रदूषण मुक्त करने का संकल्प लिया। एक गंभीर प्रश्न यह है कि प्रधानमंत्री

एक गंभीर प्रश्न यह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को वही संकल्प क्यों दुहराना पड़ा जो 28 वर्ष पूर्व उनके पूर्ववर्ती प्रधानमंत्री ने लिया था। देश के प्रधानमंत्री के संकल्प की कोई पवित्रता है भी या नहीं? यदि ऐसे ही एक के बाद दूसरे संकल्प लेने की आवश्यकता पड़ती गई, तो कोई देश के प्रधानमंत्री की किसी भी बात पर कोई क्यों विश्वास करेगा?

प्रधानमंत्री के संकल्प को भंग करने के अपराधी कौन-कौन हैं? जब इस प्रश्न का उत्तर खोजने का प्रयास करते हैं, तो पाते हैं कि इस दौरान गंगा जलग्रहण क्षेत्र में गोमुख से लेकर गंगासागर तक कितनी सरकारें बदलीं और कितने नौकरशाह आए और गए, आज किसी को याद नहीं! गंगा- सफाई के नाम पर कितना पैसा पानी में बहा दिया गया, इसका कोई हिसाब नहीं! गंगा में कितना पानी बह गया, इसका कोई भी आंकड़ा बताना अर्थहीन है, क्योंकि गंगा माई की स्थिति क्या है- जो अप्रैल 1986 में जितनी गंदी थी, वह आज अगस्त, 2017 में उससे भी ज्यादा गंदी है। यह मुँह बोलती सच्चाई है ‘गंगा एक्शन प्लान' और उसके बाद नमामी गंगे' की।

हाँ, यह जरूर हुआ कि इस दौरान गंगा को प्रदूषणमुक्त करने के नाम पर असंख्य राजनेताओं, नौकरशाहों व टेक्नोक्रेटों को अपनी सात पीढ़ियों की गरीबी से मुक्ति मिल गयी और अगली सात पुश्तों को भी जिस प्रकार चिन्तामुक्त कर दिया, वह सिर्फ बोनस में।

आप और हम रोज देखते हैं कि राज्य सरकारें, राजनेता और जनता गंगा और इसकी सहायक नदियों से पीने का पानी प्राप्त करने के अपने अधिकारों को लेकर सड़क से लेकर न्यायालय तक' किस प्रकार लड़ते हैं, परन्तु इसकी गंदगी दूर करने के नाम पर सबको साँप सँघ जाता हैऔर यदि कुछ होता भी है, तो वह है गंगा- सफाई की जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डालने का उपक्रम। अर्थात् गंगा से पीने का पानी प्राप्त करने का अधिकार हम सबका, परन्तु इसे प्रदूषणमुक्त करने का दायित्व दूसरों का। ये दूसरे कौन हैं, जो आकर हमारी गंगा माई को साफ़ करेंगे?

चौंकिए नहीं, यह कोई काल्पनिक प्रश्न नहीं है, वरन् लोकसभा में एक प्रश्न के उत्तर में जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण राज्य मंत्री साँवर लाल जाट ने 06 अगस्त, 2015 को बताया था कि जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, सिंगापुर व नीदरलैंड ने गंगा की सफाई व इसके संरक्षण के लिए भारत को तकनीकी और आर्थिक सहयोग देने की इच्छा व्यक्त की हैऔर विश्व बैंक तथा जापान इन्टरनेशनल को-ऑपरेशन एजेंसी भी इस कार्य में सहयोग कर रही है। ‘नमामी गंगे' कार्यक्रम के अंतर्गत जर्मनी से 13 अप्रैल, 2016 को तीन वर्ष के लिए एक समझौता भी हुआ, जिसके तहत वह 22.5 करोड़ रुपये की आर्थिक सहायता भी देगा।

यहाँ एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह उभरता है। कि भारत जब गंगा माई के संरक्षण के लिए विदेशों से तकनीकी सहयोग ले रहा है तो अपने देश में विद्यमान तकनीकी संस्थाएँ इस दिशा में क्या कर रही हैं। यह प्रश्न इसलिए भी महत्त्वपूर्ण हैं; क्योंकि गंगा जलग्रहण क्षेत्र में ही 6 भारतीय प्रोद्योगिकी संस्थान व 3 राष्ट्रीय तकनीकी संस्थान (1. आईआईटी रुड़की, 2. आईआईटी दिल्ली, 3. आईआईटी कानपुर, 4. आईआईटी वाराणसी, 5. आईआईटी पटना, 6. आई आईटी खड़गपुर, 7. एनआईटी इलाहाबाद, 8. एनआईटी पटना, 9. एनआईटी दुर्गापुर ) स्थित हैं। इसके साथ ही इस क्षेत्र में स्थित विश्वविद्यालयों और आभियान्त्रिकी महाविद्यालयों की संख्या तो एक सौ से कम नहीं होगी। क्या इन तकनीकी संस्थानों की नमामी गंगे' अभियान में कोई भूमिका नहीं? जो तकनीकी संस्थान प्रतिवर्ष बड़े गर्व के साथ देश को यह बताने से नहीं चूकते कि उनके यहाँ से निकले इंजीनियरों को विदेशी कम्पनियाँ एक-डेढ़ करोड़ रुपये का पैकेज देकर ले गयीं, तो क्या उन्हें सार्वजनिक रूप से यह नहीं बताना चाहिए कि गंगा सफाई और इसके संरक्षण के लिए उन्होंने 1986 से लेकर अब तक क्या किया? इस कार्य के लिए कौन-सी तकनीक और कार्यपद्धति विकसित की? क्या ये संस्थान सिर्फ बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए मानव संसाधन तैयार करने का उपक्रमभर हैं? जिस क्षेत्र में ये संस्थान स्थित हैं, क्या उस क्षेत्र के विकास के प्रति इनका कोई सामाजिक उत्तरदायित्व नहीं है? यही नहीं, ऐसे अनेक प्रश्न हैं जो इन संस्थानों के सम्बन्ध में पूछे जा सकते हैं। ये प्रश्न इसलिए भी जरूरी हैं। क्योंकि इनके संचालन के लिए आम जनता से कर के रूप में वसूल किया गया धन ही खर्च किया जाता है।आगे और--