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असुरक्षा के घेरे में जीवन
September 1, 2017 • Veena Singh

आज की स्थिति में लगता है कि हम कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं। मन- मस्तिष्क में एक भयावह वातावरण बना हुआ है। कटुता, भ्रान्ति, संदेह, भय और संघर्षों से भरे आज के समय में प्रत्येक व्यक्ति को अपना भविष्य अनिश्चित और अंधकारमय लग रहा है। भ्रष्टाचार, अनाचार, अत्याचार, हिंसा, हत्या एवं आतंक का भयावह परिदृश्य हमें मिटाने को तत्पर है। ये चीजें हमारी व्यवस्था का अंग बन चुकी हैं, जिनका रूप ही विकृत हो गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि चारों ओर सघन अंधेरा-सा छागया हो व घना कोहरा फैला हुआ हो। समझ ही नहीं आता कि किधर जाना है और क्या करना है। ऐसा लगता है कि हम उचित- अनुचित में भेद करना भूल गए हैं। इन सबके पीछे हमारे राष्ट्रीय व सामाजिक चरित्र का अवमूल्यन होना भी एक प्रमुख कारण है। हमने अपने चरित्र की गरिमा खो दी है, इसीलिए ऐसी विषम परिस्थितियाँ पैदा हो रही । हमारा नैतिक और सामाजिक जीवन ऐसी शून्यता की ओर चल रहा है जिसका न कोई लक्ष्य है और न प्रयोजन।

व्यवस्था-तंत्र और सुरक्षा

व्यवस्था-तंत्र में तो जैसे घुन ही लग गया हो। जब भी कोई बात बिगड़ती है, लोग सड़कों पर उतर आते हैं। भ्रष्ट व्यवस्था को ठीक करने के लिए आंदोलन करते हैं, खुद से वादे करते हैं, फिर बढ़ते समय के साथ चुप होकर बैठ जाते हैं। सब तो एक जैसे हैं, कौन किसे क्या कैसे कहे? राजनेता भ्रष्ट हैं। अफ़सर भ्रष्ट हैं। पुलिस भ्रष्ट है। सबसे ज्यादा चिन्ता का विषय यह है कि आम आदमी भी इस महामारी की आग से बच नहीं पाया है। दूर-दूर तक कहीं कोई ऐसा व्यक्ति दिखाई नहीं पड़ता जो इन अनेक समस्याओं का समाधान ढूँढ़ सके। हम अपने ही स्वाधीन देश, घर-परिवार समाज में सुरक्षित नहीं हैं। अभी हाल ही में गुरुग्राम के नामी स्कूल में सात-वर्षीय बच्चे की बेरहमी से की गई हत्या ने हमारे देश की सुरक्षा की पोल खोलकर रख दी। आखिर क्या कुसूर इन छोटे नन्हे बच्चों का? मानव समाज के हर धर्म और प्रत्येक संस्कृति में बच्चों को भगवान् का रूप माना जाता है। वे तो अबोध, कोमल और मासूम होते हैं, जिन्हें न किसी से ईर्ष्या, द्वेष, जाति-धर्म का बोध। उनके साथ ऐसी हैवानियत? हमारे समाज का रूप कितना विकृत हो गया है जहाँ बच्चों का बचपन सुरक्षित नहीं, बेटियों का तो पूरा जीवन ही असुरक्षित है। बूढ़े बुजुर्ग का जो घर ही सुरक्षा कवच है, वे उसी घर में असुरक्षित और उपेक्षित हैं।

बेरोजगारी सेअसुरक्षा

देश का हर नौजवान रोजगार को लेकर स्वयं को असुरक्षित महसूस करता है। उच्च स्तर की पढ़ाई करने के बाद भी नौकरी की कोई गारंटी नहीं होती। हर साल लगभग 1.30 करोड़ युवा श्रमशक्ति में शामिल हो रहे हैं, पर उन्हें मनोवाञ्छित नौकरी या काम-काज नहीं मिलता। युवाओं में ऊर्जा होती है, बहुत कुछ करने की उमंग होती है, लेकिन जब उन्हें उपयुक्त कार्य नहीं मिल पाता, तब वे कुण्ठित हो जाते हैं या पैसे कमाने के गलत रास्ते अपना लेते हैं जो उनके लिए घातक सिद्ध होता है।

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