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अनोखी है, दिल्ली की चोट मीनार
June 20, 2019 • प्रभाशंकर उपाध्याय

बहरहाल, हौजखास कॉम्लेक्स में चोर मीनार को तलाश करने में अधिक दिक्कत नहीं हुई। अगर, किसी चोर को ढूंढना होता तो ज्यादा होती। उस मीनार को एक ऊंचे चबूतरे पर बनाया गया था, जिसके चारों ओर अब, पार्क विकसित कर दिया गया है। बलुआ पत्थर से बनी हुई उस मीनार के ऊपरी खंड में चारों ओर सैंकड़ों खांचे हैं। जिनमें चोरों के सिर रखे जाते थे। इससे यह साबित होता है कि भारत वर्ष में सात सौ साल पहले भी इतनी चोरियां होती थीं कि उस मीनार में सैंकड़ों खांचे बनाने पड़े थे। पुरातत्व विभाग द्वारा वहां स्थापित प्रस्तर पट्टिका में खिलजी वंश के उस शासक का नाम नहीं लिखा है।

तुगलकाबाद की रेलवे कॉलोनी में कुछ वर्ष पूर्व रहते हुए एक बुजुर्ग ७ के मुंह से ये अल्फाज सुने- “लाट मजारों किलों की दिल्ली में है, भरमार। स्मारक एक अजीब है, दिल्ली का चोर मीनार।'' चोर मीनार शब्द से मेरा चौंकना स्वाभाविक था। गूगल पर तलाशा तो मिला, हौज खास एनक्लेव में कहीं है।

बहरहाल, एक दिना रेलवे कॉलोनी से बाहर सड़क पर आकर, ऑटो रिक्शा चालक से मैंने पूछा, “भाई! चोर मीनार चलोगे?'' वह बोला, “हां! कुतुबमीनार, जरूर चलेंगे।'' मैंने कहा, “नहीं भाई! चोर मीनार चलना है।'' वह बोला, “क्यों मजाक करते हैं?, बाबूजी! हमने तो यह नाम सुना नहीं।'' 

मैंने कहा, “यह मीनार भी दिल्ली में ही है, हौजखास एनक्लेव में। वह अभी भी अविश्वास से मुझे देख रहा था। मैंने उसे मेरी डायरी में छपा हुआ नक्शा दिखाया, यह देखो यहां लिखा है, चोर मीनार। वह पूरे विश्वास से बोला, “गलत छपा है''

मैंने कहा, “यहां से आठ किलोमीटर दूर है।'' दूर है।'' वह बोला, “चार सौ रुपए लगेंगे। अगर मीनार नहीं मिली तो यह मत कहना कि उसे ढूंढ निकालो।'' मैंने कहा, “तुम चलो, भाई! मैं तीन सौ दूंगा।''

"ठीक है।'', वह किक मारता हुआ बोला, “किराया तो देना ही होगा। मीनार मिले या न मिले।'' दरअसल, वह, मुझे सनकी व्यक्ति जानकर बात पक्की कर लेना चाहता थावह, ऑटो का क्लच दबाता हुआ बड़बड़या, "चोर भी क्या खाक मीनार बनायेंगे।'' मैंने उसके शब्द सुन लिए थे अतः बोला, “उसे एक खिलजी सुल्तान ने बनाया था। चोरों का सर कलम करके मीनार में बनी खिड़कियों में रख दिया जाता था ताकि प्रजा सबक ले सके।''

बहरहाल, हौजखास कॉम्लेक्स में चोर मीनार को तलाश करने में अधिक दिक्कत नहीं हुई। अगर, किसी चोर को ढूंढना होता तो ज्यादा होती। उस मीनार को एक ऊंचे चबूतरे पर बनाया गया था, जिसके चारों ओर अब, पार्क विकसित कर दिया गया है। बलुआ पत्थर से बनी हुई उस मीनार के ऊपरी खंड में चारों ओर सैंकड़ों खांचे हैं। जिनमें चोरों के सिर रखे जाते थे। इससे यह साबित होता है कि भारत वर्ष में सात सौ साल पहले भी इतनी चोरियां होती थीं कि उस मीनार में सैंकड़ों खांचे बनाने पड़े थे। पुरातत्व विभाग द्वारा वहां स्थापित प्रस्तर पट्टिका में खिलजी वंश के उस शासक का नाम नहीं लिखा है। कदाचित खिलजी वंश के उस सुल्तान ने इतने कठोर दंड के बावजूद चोरियों पर लगाम नहीं लग पाने की अपनी अक्षमता को छिपाने की गरज से मीनार के निर्माण में अपना नाम नहीं आने दिया हो?

चुनांचे, सुल्तान की शर्मिंदगी की बात तो आई-गई। लेकिन जरा सोचिये कि चोर मीनार के इर्द-गिर्द बसी उस पॉश कॉलोनी के वाशिंदों पर उस समय क्या बीतती होगी, जब कोई उनसे बांकी मुस्कान के साथ कहे, ''माशाअल्लाह! यह कहिए कि आपके महल्ले में चोर मीनार वाबस्ता है।'' कदाचित, इसीलिए, इसे नेस्तनाबूद कर डालने की कोशिशें भी हुई थीं किन्तु अंग्रेजों ने यह कभी नहीं चाहा बल्कि दुनिया भर में ढिढोंरा भी पीटने से भी बाज न आये कि देखो दुनिया वालों, यह चोरों की कंट्री है। कैसी विचित्र बात थी। जिन्होंने हमारे देश को जी भरकर लूटा वे ही जगत में शोर मचा रहे थे यानी चोर मचाये शोर वाली बात हो रही थी। यह स्मारक पहली बार लिखित रूप में तब आया, जब सन् 1911 में वॉयसराय ने दिल्ली की सभी पुरानी इमारतों की सूची बनाने का जिम्मा एक अंग्रेज अफसर को सौंपा था। उस सूची में चोर मीनार का नाम भी था।

आजादी के बाद मीनार को हटा देने की कोशिशें फिर हुईं किन्तु उसे भारत के पहले प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरू के दखल से इसे संरक्षित इमारत में शामिल किया गया और मामला वहीं टांय टांय फिस्स हो गया। लब्बेलुआब यह कि मुई चोर मीनार अपनी आन-बान और शान से खड़ी हुई अभी तक इतरा रही है।

मुझे मीनार के नीचे कुछ युवक दिखाई दिए। वहां से मीनार पर चढ़ने के लिए सीढियां हैं लेकिन सीढियों को लोहे की छड़ों से बने एक दरवाजे से बंद कर, ताला लगा दिया गया हैवहां खड़े वे लड़के, उस जंगले में से ताका-झांकी का प्रयास कर रहे थे। मैंने पूछा कि क्या देख रहे हो तो वे बोले, "हमने सुना है कि यहां चोरों के भूत डोलते हैं। उन्हें देखना चाहते हैं, हम। देखो अंकल, इस जंगले के अंदर से उनकी आवाजें आ रही हैं।'' मैंने भी अंदर झांकने का यत्न किया। सीलन की गंध महसूस हुई। मैंने लड़कों से कहा कि वे आवाजें किसी भूत की नहीं बल्कि चमगादड़ों की हैं, जो मीनार के अंदर चिमगोईयां कर रहे हैं।