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अध्यात्म और विज्ञान
July 1, 2017 • Sukhanandan Singh Sadya

भारतीय मनीषियों ने मनुष्य को अमृतस्य पुत्राः कहकर अमृतस्य पुत्राः कहकर सम्बोधित किया है। सचमुच देखा जाय तो मनुष्य इस सृष्टि का गौरव है। मनुष्य ने सृष्टि के प्रारम्भ से लेकर अब तक अपने ज्ञान के गवाक्ष से अनेक रहस्यों को उद्घाटित करने का प्रयास किया है। दार्शनिक-चिन्तन, नैतिक, कलात्मक, सामाजिक, आर्थिक, वैज्ञानिक एवं राष्ट्रीय चिन्तन के अतिरिक्त आध्यात्मिक चिन्तन की दिशा में उसने हमेशा विकास की दिशा में बढ़ने का प्रयास किया है। प्रत्येक क्षेत्र में उसके चिन्तन के विकास ने अन्ततः किसी शाश्वत सत्य की तलाश का प्रयास भी जारी रखा। मगर जो शाश्वत होता है, वह समयनिरपेक्ष हो जाता है। उसका अस्तित्व भूत, भविष्य और वर्तमान की सीमा-रेखा लाँघ जाता है। भारत में उस शाश्वत सत्य की खोज का आधार आध्यात्मिक रहा है और परम सत्य को जानने के लिए हमेशा अन्तर्मुख होकर, आत्मभूमि में उतरकर समाधिजन्य अवस्था में उसे अनुभूत करने का प्रयास किया गया है। प्रकृति के समस्त ज्ञान को बौद्धिक धरातल पर विशेष रूप से समझने का प्रयास विज्ञान कहलाता है और विज्ञान भी प्रकृति के समस्त ज्ञान का एक परम स्रोत जानने को अपना अन्तिम लक्ष्य मानता है। संसार के सारे पदार्थों के अस्तित्व के पीछे कौन-सा एकत्व विद्यमान है, यह खोज विज्ञान का चरम लक्ष्य है। मगर अध्यात्म के क्षेत्र में समस्त जड़ और चेतन तत्त्वों की अनुभवपरक खोज और उसका नित्य अनादि स्वरूप जानना तथा अपनी आत्मसत्ता को उस परमात्म सत्ता के साथ जोड़ देना ही जीवन का परम लक्ष्य माना गया है।

समय की शिला पर अनेक चिन्तन विकसित होते रहे, मगर बीसवीं शती के आते-आते विज्ञान के आविष्कारों ने मनुष्य को बहुत कुछ सोचने के लिए बाध्य कर दिया। जिस सृष्टि के कतिपय रहस्यों को हम तथाकथित धार्मिक संवादों के माध्यम से रूपायित करने का प्रयास करते थे, उसकी वैज्ञानिक खोज ने एक बार उन धार्मिक चिन्तनों को झकझोर दिया। धर्म के नाम पर गढ़ी गई सृष्टि की व्याख्या बौद्धिक धरातल पर लड़खड़ाने लगी। निकोलस कोपरनिकस (1473-1543) ने पहली बार कहा कि ब्रह्माण्ड का केन्द्र पृथिवी नहीं, सूर्य है। सर आइज़क न्यूटन (1642-1727) ने गुरुत्वाकर्षण की व्याख्या की। इस दिशा में भारतीय वैज्ञानिकों का चिन्तन भी विस्मयकारी रहा। कोपरनिकस से एक हजार वर्ष पहले आर्यभट्ट ने यह खोज की थी कि पृथिवी ही सूर्य की परिक्रमा करती है। इसी तरह न्यूटन से भी पहले भास्कराचार्य ने सूर्यसिद्धान्त और गुरुत्वाकर्षण का नियम प्रतिपादित किया था। महर्षि चरक और सुश्रुत ने चिकित्सा के क्षेत्र में अन्यतम ऊँचाइयों को छुआ था। शून्य की खोज, रेखागणित की खोज और दशमलव-पद्धति का आविष्कार भी भारतीय मनीषियों ने ही किया था। हमारे प्राचीन ऋषियों ने तो जड़ और चेतन-जगत् के समस्त रहस्यों को अनावृत्त करते हुए अपनी समाधिजन्य अवस्था में अनेक मंत्रों का उद्घोष किया था, जो हमारे वैदिक वाङ्मय में परिलक्षित हैं। मगर कालान्तर में ज्ञान-साधना का धरातल पूर्ववत् नहीं रहने के कारण यह ज्ञान-विज्ञान कुंठित भी होता रहा। बीसवीं सदी तक आते-आते विज्ञान ने सचमुच एक चमत्कार कर दिखायादूरदर्शन, कंप्यूटर, इलेक्ट्रॉनिक्स, आदि के क्षेत्रों में इतना विकास हुआ कि अब हम घर बैठे इंटरनेट पर सारे विश्व से सम्पर्क स्थापित कर सकते हैं। मगर एक ओर विज्ञान ने जहाँ मनुष्य की सुख-सुविधाओं का अम्बार लगा दिया और दुनिया सिमटकर उसके पास आ गई, वहीं उसने मनुष्य के विनाश के लिए भी रास्ते खोल दिए और मानव-मानव के हृदय के बीच दूरी भी पैदा कर दी। ओपेनहॉवर ने सन् 1945 में परमाणु बम के परीक्षण के समय जो दृश्य देखा, उससे उसकी आत्मा भी काँप उठी। आज विज्ञान हमें विध्वंस का जो यंत्र थमा गया है, उसके बारे में सोचकर ही हम सिहर उठते हैं।

इसी क्रम में यूरोप के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. फ्लेमिंग ने सन् 1914 के ‘साइंस वीक' में अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि विज्ञान और धर्म न तो परस्पर विरोधी हैं। और न एक दूसरे की उपेक्षा करते हैं। बल्कि एक दूसरे के सहायक भी हैं। इसी प्रकार प्रसिद्ध वैज्ञानिक मिलिकन ने अपनी कृति । ‘इवोल्यूशन इन साइन्स एण्ड रिलिजन' में कहा कि विज्ञान और अध्यात्म- इन दोनों शक्तियों के समन्वय की प्रक्रिया प्रारम्भ हो । है। इस सम्बन्ध में प्रसिद्ध फ्रेंच चिकित्साविज्ञानी डॉ. हार्टमैन (1860-1952) ने कहा कि विज्ञान हमारी बुद्धि की देन है, तो अध्यात्म ईश्वरी ज्ञान की देन है।

विज्ञान का लक्ष्य जहाँ प्रकृति का विश्लेषण करना है, वहाँ अध्यात्म जीवन-दर्शन-सम्बन्धी समस्त समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करता है। इसके साथ ही सृष्टि के अनन्त रहस्यों में से विज्ञान की खोज एक अत्यन्त लघु अंश को ही खोजने में सक्षम हो सकी है। शायद इसी परिदृश्य को देखकर सर आइजक न्यूटन ने कहा था, "जब मैं अपने सम्बन्ध में विचार करता हूँ तो लगता है कि अल्पवय बालक की तरह किसी समुद्र के किनारे खेल रहा हूँ। ज्ञान-कण जो मैंने पाए हैं, वह अथाह सागर की कुछ सीपियों की तरह हैं। जो अथाह और असीम है, वही शाश्वत और सत्य है, उसका रहस्य मैं समझ नहीं पाता हूँ।''

इसी कड़ी में अल्बर्ट आइन्स्टीन (1879-1955) को भी कहना पड़ा था कि विज्ञान की सीमा जहाँ समाप्त होती है, अध्यात्म की सीमा वहाँ से प्रारम्भ होती है। उन्होंने यह भी कहा कि जितना ही मैं भौतिक विज्ञान पढ़ता हूँ, उतना ही मैं आध्यात्मिक ज्ञान की तरफ खिंचता चला जाता हूँ। सचमुच इस सम्पूर्ण सृष्टि में जो विज्ञान के सूत्र भरे पड़े हैं, वे किस महान् वैज्ञानिक द्वारा बनाए गए हैं? विज्ञान तो अभी भी उसका अंश ही खोज सका है।

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