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अध्यात्मविज्ञानी : दूरदर्शी एवं सक्षम नेता
April 1, 2017 • L. Karnal Atam Vijay Gupta

सामान्य लोगों के विचारों एवं व्यवहार को भौतिक धरातल से अध्यात्म की और मोड़ना आध्यात्मिक वैज्ञानिकों के लिए चुनौती है। इसमें सफलता प्राप्त करने के लिए लक्ष्य की स्पष्टता, एकाग्रता समय तथा छोटे-छोटे पड़ावों सहित एक विशिष्ट योजना की आवश्यकता है।

सर्वप्रथम अध्यात्म की धारणा की सरल व्याख्या आवश्यक है। इसके पश्चात् व्यावहरिक विज्ञान, सामाजिक विज्ञान तथा मनोविज्ञान में समन्वय हेतु साधनों तथा मार्ग का विचार करने की आवश्यकता है। तीसरा कार्य विज्ञान की विभिन्न श्रेणियों एवं अध्यात्म में समन्वय लाकर, उसे लोगों में प्रचारित करने के लिए सामग्री छापना है। चतुर्थ कदम कार्यरूप देनेवाली कुशलताओं का खाका तैयार करना है। पाँचवाँ कदम इन कुशलताओं को व्यवहार रूप देने के लिए प्रशिक्षकों एवं प्रशिक्षितों के लिए। कार्ययोजना बनाना है। छठा कदम है। अध्यात्म तथा विज्ञान की विभिन्न श्रेणियों में। समन्वय हेतु संरचना से रचनात्मक ढाँचाइ तैयार करना। सातवाँ कदम है प्रशिक्षितों एवं प्रशिक्षकों का चयन करना। आठवाँ कदम है। ‘केवल अध्यात्म ही संतुलित एवं उत्तम अध्यात्म ही संतुलित एवं उत्तम जीवन का आश्वासन दे सकता है, इस विचार को लोगों में प्रचारित करने के लिए शिक्षण योजना के अंतर्गत कार्ययोजना बनाना।

व्यवस्थापकों की एक सुदृढ़ टोली तैयार करनी होगी। प्राचीन काल में राजाओं के मार्गदर्शन के लिए धर्माचार्य होते थे तथा प्रत्येक राज्य में राज्य धर्म' का राज्य के कोण के माध्यम से निर्वहन किया जाता था। चंद्रगुप्त मौर्य तथा अशोक के राज्यकाल का समय इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। विश्व में केवल वैटिकन सिटी ऐसा देश है जहाँ का राज्य धर्म ईसाइयत है तथा राजनैतिक मुखिया तथा धार्मिक मुखिया- दोनों ही ईसाई हैं। वैटिकन देश के संविधान के अनुसार कोई गैर-ईसाई व्यक्ति राज्य का मुखिया नहीं हो सकता।

अधिकांश यूरोपीय एवं मुस्लिम देशों में प्रत्यक्ष ईसाइयत एवं इस्लाम ही क्रमशः राज्य धर्म हैं। परन्तु उपस्थित विषय के संदर्भ में सक्षम-दूरदर्शी नेताओं को उपर्युक्त विचारधारा में सुधार लाना होगा। विश्व के सभी राष्ट्रों को कोई विशिष्ट राजधर्म नहीं अपितु ‘अध्यात्म राज्य की धारणा को स्वीकार करना होगा। वैश्विक नीति के अंतर्गत 'वैश्विक धर्म के नाते वैश्विक अध्यात्म का विचार ही बहुसंख्य राष्ट्रों को स्वीकार्य हो, ऐसी मानसिकता तैयार की जा सकती है। विन्सटन चर्चिल ने कहा था तभी भावी राज्य-शक्तियाँ संतुलित मानसिकतावाली हो सकेंगी। अतः सक्षम नेताओं के लिए चुनौती होगी ‘भावी मानसिकता का विश्लेषण एवं उसमें सकारात्मक परिवर्तन लाना' । भावी पीढ़ियों को समझाना होगा कि वैश्विक मस्तिष्क अनुशासित, आदरणीय, रचनात्मक तथा नैतिक मस्तिष्कों का सुन्दर समन्वय है। यह चुनौती अत्यन्त गंभीर है, परंतु सक्षमदूरदर्शी नेतृत्व-आध्यात्मिक नेतृत्व द्वारा ही इस कार्य को करना संभव होगा। उनमें ही लोगों के विशाल समूह को प्रभावित करने की क्षमता है। अपने प्रभाव से वे विभिन्न मानसिकतावाले लोगों को मिलकर काम करने के लिए तैयार कर सकेंगे। उनके अतिरिक्त कोई भी अन्य व्यक्ति इस कार्य को करने में सफल नहीं होगा।

यद्यपि वर्तमान परिस्थितियों में ऐसा आभास होता है कि युवा पीढ़ी भौतिकतावादी मानसिकतावाली बन चुकी , परन्तु इस वास्तविकता को नकारा नहीं जा सकता कि वर्तमान पीढ़ी पुरानी पीढ़ी से अधिक बुद्धिमान है। वे तर्कसंगत ढंग से एकाग्रता (तन्मयतापूर्वक कार्य करते हैं, उन्हें प्रोफैशनल या व्यावसायिक समझवाले अथवा सफल व्यापारी कहा जा सकता है। कोई भी कार्य या व्यवस्था आरंभ करने से पूर्व वे सोचते हैं कि विभिन्न कार्य-पद्धतियों में से किस पद्धति को अपनाने से उन्हें अधिक लाभ होगा। वे अपने मस्तिष्क का प्रयोग करके कार्ययोजना बनाते हैं; क्योंकि यह सत्य है कि सामान्य व्यक्ति प्रायः दुविधा रहते हैं, अतः वे सरल मार्ग अपनाने का ही प्रयास करते हैं तथा परिणामस्वरूप वे भटक जाते हैं तथा भ्रमित होकर वही मार्ग अपना लेते हैं जो बहुसंख्यक सामान्य लोग अपनाते हैं तथा भौतिकतावादी हो जाते हैं। वे इसी मार्ग को ही उपयुक्त तथा संतोषजनक मान लेते हैं। वे पर्याप्त समय तक इसी विचारधारा से जुड़े रहते हैं; क्योंकि भौतिकतावादी जगत् में उसे जल्दी सुखदायक साधन प्राप्त हो जाते हैं। यद्यपि सुख व साधन आत्मजीवी होते हैं, परन्तु वे उन्हें हितकारी एवं संतोषजनक मान लेते । परन्तु इस सत्य को वे देर से जान पाते । युवावस्था में वे अनुभव नहीं कर पाते कि उनके द्वारा अपनाया गया मार्ग चिरस्थाई एवं सुख देनेवाला नहीं तथा स्थायी प्रसन्नता सुख अध्यात्म के मार्ग से प्राप्त हो सकता । अतः अध्यात्मविज्ञानी के लिए यह अनिवार्य हो जाता है, कि वे आधुनिक युवा पीढ़ी की मानसिकता में वांछित परिवर्तन लाने के लिए प्रयत्न करें ताकि वे समझ सकें कि बहिर्मुखी होने की अपेक्षा अन्तर्मुखी होने से ही वास्तविक शांति प्राप्त होगी।

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