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अच्छा है इंडिया', ओह.. ऑसम
January 1, 2019 • Parmod Kumar Kaushik

अच्छा है इंडिया', ओह.. ऑसम

लंदन देखा पेरिस देखा और देखा जापान, सारे जग में कहीं नहीं है दूसरा हिन्दुस्तान। कोई भारतीय ‘परदेस' फिल्म के इस गीत को गुनगुनाए तो निश्चित तौर पर देशप्रेम की भावना है। मगर, विदेशी भी इसमें सुर मिलाएं तो? जाहिर है कि कोई खास वजह होगी। यह खासियत है भारतीय संस्कृति, संस्कार और अगाध आस्था के संमदर की, जो सात संमदर पार से सैकड़ों विदेशियों को प्रयागराज कुंभ खींच लाई है। वह आस्था नहीं, अचरज में डूबे हैं। जरा सा मन टटोला तो भाव निकलकर आए कि मुम्बई, हैदराबाद और बंगलुरू वाला ‘इंडिया' तो पहले भी देख चुके हैं। वह अच्छा है, लेकिन प्रयागराज वाला ‘भारत' देखा है, जो सच में अद्भुत है, उनकी भाषा में ऑसम है।

दिन से ज्यादा जीवंत रहती है अखाड़ों की रात

अखाड़ों की रात्रि शाम गहराने के साथ और जीवंत होने लगती है। अखाड़ों में साधु संतों के भक्तों की भीड़ जमा हो जाती है। संतों के विभिन्न शिवरों में धर्म अध्यात्म के साथ कुंभ की व्यवस्थाओं पर भी चर्चा होती है। धूनी लगाकर दिनभर श्रद्धालुओं को आशीर्वाद देने वाले नागा संन्यासी भी अपनी साधना में रम जाते हैं।

डाउनलोड कीजिए यह एप जानिए क्या है कुंभ

कुंभ को जानना है तो सिर्फ अपने मोबाइल फोन में ‘कुंभ' नाम का एप डाउनलोड करें। इस एप में कुंभ से जुड़ी पूरी जानकारी समाहित की गई है। लोगों को कुंभ से जोड़ने में यह एप मददगार साबित हो रहा है, जिसमें अलग-अलग फाइल में पूरी जानकारी है। क्या है कुंभ का महत्त्व, प्रयाग को क्यों कहा जाता है तीर्थों का राजा, को भी विस्तृत रूप से दिखाया गया है।

हजारों ने पाया मोक्ष का वरदान

कुंभ की अद्भुत, अलौकिक दुनिया देशविदेश से कुंभ में कल्पवास और संगम स्नान करने आने वाले श्रद्धालुओं को खूब भा रही है। लाखों श्रद्धालु के लिए कौतूहल का विषय बना किला स्थित अक्षयवट भी आस्था का केंद्र बना हुआ है। यही वजह है कि 10 जनवरी से लेकर अब तक अक्षयवट दर्यान करने वालों की संख्या पाँच लाख से ऊपर पहुँच गई है। मोक्ष की कामना को लेकर अक्षयवट दर्शन करने वालों की संख्या मकर संक्राति से प्रतिदिन एक लाख से ऊपर पहुँच गई है।

हरियाणा से प्रयागराज तक मिला सरस्वती का रास्ता

प्रयाग में गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम है। माना जाता है कि सरस्वती काल्पनिक नदी है। वह प्रयाग कभी नहीं पहुँची। भूचाल आने के कारण जमीन ऊपर उठी तो सरस्वती का पानी यमुना में गिर गया और दोनों का जल प्रवाहित होने लगा, लेकिन कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस ऑन रिसर्च ऑफ सरस्वती रिवर ने इस धारणा को गलत साबित किया है। उसने एक पैलियो चैनल (नदी की पुरानी शाखा) खोज निकाला है, जो आदि बद्री (हरियाणा के यमुनानगर में स्थित) से सरस्वती को सीधे प्रयागराज तक जोड़ता हैं।

काशी में आज से प्रवासियों का महाकुंभ'

तीन दिवसीय 15वें प्रवासी भारतीय सम्मेलन का आगाज सोमवार से आध्यत्मिक नगरी काशी में होने जा रहा है। नए भारत के निर्माण में प्रवासी भारतीयों की भूमिका थीम पर आधारित इस आयोजन में पहले दिन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की उपस्थिति में युवा सफल प्रवासी भारतीयों से प्रेरणा लेंगे। दिन भर चलने वाले आयोजनों के क्रम में बीएचयू में सफल युवा प्रवासी भारतीयों संग युवाओं का भी संवाद प्रस्तावित है।

मिला गंगाजल तोलगाया माथे

काशी पहुँचे प्रवासियों को दीनदयाल हस्तकला संकुल में परिचय पत्र वितरित किया। जिसके साथ रुद्राक्ष की माला, तांबे का लोटा और गंगा जल के साथ आयोजन से जुड़ी सामग्री मिली तो प्रवासियों ने उसे अपने सिर माथे लगाकर खुद को धन्य भी महसूस किया।

जूना अखाड़ा ने लिखा सनातन धर्म में नया अध्याय

संगम नगरी प्रयाग में श्याम यमुना तट पर 12 जनवरी की रात सनातन धर्म में नया अध्याय लिखा गया। वह अध्याय था किन्नर संन्यासियों को श्रीपंच दशनाम जूना अखाड़ा द्वारा अपनाना। सामाजिक व धार्मिक क्षेत्र में उपेक्षित चल रहे किन्नर संन्यासियों को जूना अखाड़ा ने ससम्मान अपने साथ लेकर चलने का निर्णय लिया। जूना ने किन्नर अखाड़ा को अग्नि व अवाहन अखाड़ा की भांति रखने का निर्णय लिया। इससे किन्नर अखाड़ा की प्रतिष्ठा स्थापित हुई।

अदब की बेटियों को मिला खुशियों का खजाना

सेक्टर 14 स्थित महामंडलेश्वर प्रखर महराज के प्रखर परोपकार मिशन अस्पताल में शनिवार को नकाब पहने कुछ युवतियाँ मरीजों की सेवा करती नजर आई। गले में आला लटकाए ये युवतियाँ और साथ में कुछ युवक बीमार साधुसंतों की देखभाल कर रहे थे। कुछ के माथे पर चंदन का टीका भी लगा था। यह देख आश्चर्य हुआ कि नकाब पहने युवतियाँ और चंदन लगाए युवक पूरे मन से सेवाकार्य में जुटे हैं। पूछने पर पता चला कि यह सब अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) में मेडिकल विभाग के विद्यार्थी हैं और पहली बार कुंभ में आने का मौका मिला है। यहाँ आने के बाद उन्हें लग रहा है जैसे खुशियों का खजाना मिल गया।

अनोखा संगम, सनातनी गंगा से मिली सिंध की सुफी धारा

सनातन धर्म यानी ऐसी गंगा, जिसमें अनगिनत मत, पंथ और मान्याताओं का संगम है। जैसे गंगा में तमाम नदियाँ मिलकर उसकी हो जाती हैं, अपनत्व और सद्भाव के ऐसे ही सुंदरपावन दृश्य ने कुंभ नगरी को सींचा। दो देशों के सियासी खारेपन को कतई खारिज कर पाकिस्तान के सिंध से सुफी संस्कृति के संत साईं सादराम साहिब अनुयायियों सहित संगम दर्शन को पहुँचे।

कुंभ में गंगा मोक्षदायिनी और मोहर्रम में नियामत

शब-ए-बरात की रात करीब तीन बजे शिया समुदाय की महिलाएँ पुरुष, बच्चे, बूढ़े सभी गंगा बैराज, जाजमऊ गंगापुल, मैस्कर घाट समेत अन्य घाटों के पास गंगा किनारे पहुँचते हैं। इनके पास कागज में मन्नत लिखी अरीजा यानी अर्जी होती है। इसे आटे की लोई में लपेटकर गंगा में इमाम जमाना के नाम से डालते हैं। इनमें वह भी शख्स शामिल होते हैं, जो पिछले साल की मुराद पुरी होने पर मन्नत उतारने आते हैं। फर्रुखाबाद में गंगाजल से वजू कर नमाज पढ़ी जाती है।

अवधूतनी बन फहरा रहीं नागा साधुओं की धर्म ध्वजा

नागा संन्यासियों के जूना अखाड़े में महिला संन्यासियों के नागा धर्म निभाने के कौतूहल भरे सवाल के साथ जब वहाँ दसतक दी गई तो इस पर विराम लग गया। दरसअल अखाड़े में महिलाओं को नागा बनाए जाने की कोई परंपरा नहीं है। महिलाएँ वस्त्र धारण करती हैं और नागा की जगह अवधूतनी कही जाती हैं। अखाड़े की संन्यासी बनने के लिए महिलाओं को पहले गुरु के समक्ष संकल्प की प्रतिबद्धता सिद्ध करनी होती है। इसे सिद्ध करने में कई बार 10 से 12 बरस भी लग जाते हैं। युवा अवधूतनी महंत पूजा पुरी बताती है कि रिश्तों से त्याग के लिए ही संस्कार प्रक्रिया में कफन का इस्तेमाल किया जाता है। कहने का सीधा मतलब है कि माई-बाप मरणम्, गुरुजी शरणम्। उसके बाद अखाड़े के रिश्ते ही रह जाते है, जिन्हें चाचा गुरु, दादा गुरु, गुरु भाई जैसे नाम दिए जाते हैं। गुरु का पुरुष होना जरूरी नहीं, अधूतनी को भी शिष्य परंपरा बनाने का अधिकार है।