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अखण्ड पार्वत्यटिल्य
October 1, 2016 • Dr. Udayan Indurkar

पसिद्ध पुरातत्त्वविद् विदुषी डॉ. देवंगाना देसाई ने अपने जीवन के अनेक वर्ष खुजराहो के मन्दिरों के अध्ययन में बिताये। उनका मत है। कि 'प्राचीन हिंदू-मन्दिर मानव द्वारा पृथिवी पर आध्यात्मिक शान्ति लाने के प्रयत्नों का प्रतिनिधित्व करते हैं। वास्तव में पत्थर में विश्व को गढ़ने (तराशने) का चमत्कारी प्रयोग वास्तुशास्त्र के इतिहास में अनूठा है।

इन अनूठे प्रयोगों में महाराष्ट्र के । औरंगाबाद जिले में स्थित एलोरा के कैलास मन्दिर का उदाहरण प्रमुख रूप से ध्यान देने योग्य है। प्रचलित लोककथा के अनुसार ‘राष्ट्रकूट के शासक कृष्ण-प्रथम (768783) की रानी मानिकावती इस मन्दिर के निर्माण की प्रमुख माध्यम बनीं। काञ्चीपुरम् के कैलासनाथ मन्दिर के दर्शन करने के पश्चात् रानी ने अपने पति से महाराष्ट्र में भी वैसा ही मन्दिर बनवाने की प्रार्थना की। परंतु राजनैतिक गतिविधियों में अधिक व्यस्त होने के कारण राजा बहुत समय तक उनकी प्रार्थना अनसुनी करते रहे। अंत में एक दिन रानी ने क्रोधपूर्वक संकल्प व्यक्त किया कि जब तक उनके राज्य में कैलासनाथ मन्दिर के कलश जैसे भव्य मन्दिर का कलश नहीं बनेगा, वे खाना-पीना छोड़ देंगी। उनकी भूख-हड़ताल के कुछ दिन बीतने पर राजा को आभास हुआ कि रानी अपने निश्चय पर अटल रहेंगी। तब वह बहुत दुःखी एवं निराश हो गये।

राजा व रानी की यह दशा देखकर पैठण के एक कुशल शिल्पी ने राजा को आश्वासन दिया कि वह रानी की इच्छा पूर्ण करेगा। राजा को आश्चर्य तो हुआ, परंतु उनके पास उसकी प्रार्थना स्वीकार करने के अतिरिक्त अन्य कोई उपाय भी नहीं था। शिल्पी एक पहाड़ी पर चढ़कर वहाँ दो दिन तक कुछ कार्य करता रहा। अंत में वह रानी के पास गया तथा कहा कि उनकी इच्छा के अनुसार काम कर दिया गया है। वह रानी को पहाड़ी पर उस स्थान पर ले गया जहाँ वह दो दिनों तक कार्यरत था। रानी ने देखा कि दूर कुछ कपड़े से ढका हुआ ढाँचा-सा था। शिल्पी ने कपड़ा हटाया। रानी ने एक कलश के दर्शन किये। रानी ने शिल्पी से पूछा ‘मन्दिर कहाँ है? यह तो केवल मन्दिर का कलश है। शिल्पी ने उन्हें स्मरण कराया कि उनका व्रत कैलासनाथ मन्दिर के कलश-जैसा ऊँचा व बड़ा कलश देखने के लिए था। उसने प्रार्थना की कि वह अपना उपवास खोल दें, वह शीघ्र ही पहाड़ी में से मन्दिर तराशना आरंभ कर देगा। इस प्रकार पहाड़ी के एक तरफ से मन्दिर तराशने का काम आरम्भ हुआ।

ऐसा माना जाता है कि मन्दिर निर्माण- कार्य 8वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में आरंभ किया गया। पहाड़ी के ऊपर मन्दिर का जो भाग आज भी हम देख सकते हैं, के साथ- साथ पूर्ण मन्दिर का निर्माण प्रमुख शिल्पी के जीवनकाल में ही हो गया। बड़ौदा से प्राप्त एक ताम्रपत्र पर इस मन्दिर के बारे में विस्तारपूर्वक वर्णन मिलता है। उसमें लिखा है कि शिल्पी इस मन्दिर को देखकर स्वयं भी चकित हो गया। उसके मुख से अकस्मात् ही ये शब्द उच्चरित हुए ‘एतस्वयंभु शिवधाम न कृत्रिमे।' शिवजी का यह धाम स्वयं ही निर्मित हो गया है; यह मैंने नहीं बनाया। ऐसा कहकर वह शिल्पी वहाँ से प्रस्थान कर गया। आज तक कोई न जान सका कि वह महान् शिल्पी कौन था। न ही अन्य महानुभावों के बारे में कुछ जानकारी या मिली जिन्होंने प्रमुख शिल्पी का सहयोग किया।

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