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अंग्रेजों का साहित्य-प्रेम
May 1, 2018 • Acharya Mahaveerprasad Dhrivedi

हमारे हिंदी-साहित्य की दशा बहुत गिरी हुई है। इसका कारण यह है कि हमारे लेखकों, प्रकाशकों और पुस्तक- विक्रेताओं को यथेष्ट धन-प्राप्ति नहीं होती। सर्वसाधारण लोगों में पुस्तक खरीदने और पढ़ने का उत्साह और शौक नहीं के बराबर है। खोटे-खरे की पहचान करनेवाले समालोचकों का भी अभाव है। पहले तो अच्छी पुस्तकें लिखी नहीं जातीं, यदि कोई ई लिख भी गई, तो लेखक को उसकी मिहनत का भरपूर बदला नहीं मिलता, यहाँ तक कि बेचारे प्रकाशक को अपनी लागत तक वसूल करना मुश्किल हो जाता है। पर इंग्लैण्ड की दशा यहाँ की ठीक उलटी है। वहाँ के लेखकों, प्रकाशकों और पुस्तक- विक्रेताओं की हमेशा पाँचों उँगलियाँ घी में रहती हैं। सर्वसाधारण में पुस्तकें खरीदने और पढ़ने का शौक इतना बढ़ा-चढ़ा है। कि सिर्फ एक ही दिन में किसी-किसी पुस्तक की हजारों कॉपियाँ बिक जाती हैं। छोटे-छोटे लेखकों तक को इतनी आमदनी हो जाती है कि उन्हें दूसरा रोजगार नहीं करना पड़ता। अच्छे लेखकों की तो बात ही जुदा है। वे तो थोड़े ही दिनों में अच्छे- खासे मालदार हो जाते हैं। अंग्रेजी-साहित्य की उन्नत दशा में होने का यही मुख्य कारण है। एक साहब ने अंग्रेजी-साहित्य के आर्थिक पक्ष को लेकर एक लेख लिखा है। उसमें से मुख्य-मुख्य दो-चार बातें हम यहाँ पर लिखते हैं।

इंग्लैण्ड के समालोचकों का यह स्वभाव-सा सो गया है कि वे ग्रन्थकारों की पुस्तकों की बड़ी कड़ी समालोचनाएँ करते हैं और पुराने तथा प्रसिद्ध लेखकों को हैं और पुराने तथा प्रसिद्ध लेखकों को प्रसन्न रखने की चेष्टा किया करते हैं। अंग्रेज़ बड़े ही साहित्य-प्रेमी हैं। इसका प्रमाण यह है कि नयी पुस्तकें खूब महंगी होने पर भी बहुत बिकती हैं। और एक- एक पुरानी पुस्तक के सैकड़ों सस्ते से संस्करण छापते हैं। जो चीज अंग्रेजों को पसन्द आ गई, उसके लिए खर्च करने में वे बड़ी दरियादिली दिखलाते हैं। वे आश्चर्यजनक, मनोरञ्जक और शिक्षाप्रद बातें बहुत पसन्द करते हैं। इसी से वे खेल-तमाशा, शिकार, अगम्य देशों की यात्रा और जीवन-चरित्र-सम्बन्धी पुस्तकों के बड़े शौकीन हैं।

इंग्लैण्ड में ऐसे बहुत-से पुस्तकालय हैं। जो नियत चन्दा देने पर अपने मेम्बरों को पुस्तकें पढ़ने को देते हैं। कैसी महंगी, कोई पुस्तक क्यों न हो, ये उसकी हजारों कॉपियाँ लेने का ठेका, छप जाने से पहले ही लेते हैं। इससे पुस्तकें खूब महँगी हो जाती हैं। अकेले ‘टाइम्स' के पुस्तकालय के 80,000 चन्दा देनेवाले मेम्बर हैं। इंग्लैण्ड के वर्तमान प्रसिद्ध उपन्यासलेखकों में से किसी का उपन्यास ज्यों ही छपा, त्यों ही अपने मेम्बरों के लिए बारह हज़ार कॉपियाँ वह तुरन्त ले लेता है। हमारे पाठकों को मालूम कि महारानी विक्टोरिया के पत्र हाल ही में पुस्तकाकार प्रकाशित हुए हैं। यह हद से ज्यादा महंगी पुस्तक है। जिस पर भी उक्त पुस्तकालय ने अकेले ही इस पुस्तक की 45,000 रुपये की कीमत की ज़िल्दें खरीद ली हैं।

पर जैसे नयी पुस्तकें अधिक-सेअधिक महंगी होती हैं, वैसे ही पुरानी पुस्तकों के सस्ते-से-सस्ते सस्करण, सैकड़ों की तादाद में, निकलते चले आते हैं। अंग्रेज़-लेखकों और प्रकाशकों ने अपने तजुरबे से यह नतीजा निकाला है कि सस्ती पुस्तकों से लोगों को पढ़ने का चसका जहाँ एक बार लग गया तहाँ वे नयी पुस्तकें, महंगी होने पर भी खरीदने को मजबूर होते हैं।

यह कहने की आवश्यकता नहीं कि सारे साहित्य-व्यापार की जड़ लेखक ही हैं। उन्हीं की कदर या नाकदरी पर साहित्य की उन्नति या अवनति का दारोमदार है। यह कहा जा चुका है कि इंग्लैण्ड के लेखक खुब रुपया पैदा करते हैं- इसके कुछ उदाहरण भी सुन लीजिये। वहाँ ‘स्टैंड' और 'ब्लेकउड' नामक दो प्रसिद्ध मासिक पत्र हैं। वे अपने लेखकों को 45 से 75 रुपये तक प्रति हजार शब्दों के देते हैं। मामूली मासिक पत्र भी कम-से-कम अपने लेखकों को बत्तीस रुपये प्रति हजार शब्दों के देते हैं। अधिक-से-अधिक की बात ही न पूछिए। उपन्यासकारों को प्रति शब्द के हिसाब से उजरत दी जाती है। जब, 1894 में स्टेविन्सन नामक उपन्यास-लेखक मरा, तब हिसाब लगाने से मालूम हुआ कि अपने जीवनभर में में जितने शब्द उसने लिखे, छः आने प्रति शब्द के हिसाब से उसको उजरत मिली। पर आज-कल यह दर कुछ बहुत नहीं समझी जाती। ‘ग्रियर्सन्स मैगजीन के प्रकाशक ने एक किस्से के लिए उसके लेखक किर्पालग साहब को बारह आने प्रति शब्द दिये थे। सर आर्थर केनन डायल जासूसी किस्से लिखने में बड़े सिद्धहस्त हैं। उन्होंने उक्त मासिक पत्र में जो आख्यायिकाएँ लिखी हैं, उनमें से प्रत्येक आख्यायिकाएँ लिखी हैं, उनमें से प्रत्येक आख्यायिका का पुरस्कार उनको 11,030 रुपये मिले हैं। अर्थात् प्रति शब्द सवा दो रुपये, या प्रति पंक्ति साढ़े बाईस रुपये!!! वेल्स नामक एक साहब अपने लेखों के लिए प्रति एक हजार शब्दों के 455 रुपये पाते हैं। हम्फ्री वार्ड नाम की एक मेम साहिबा को अमेरिका की मासिक पुस्तकें उनके उपन्यासों की लिखाई एक लाख शब्दों के डेढ़ लाख रुपये देती हैं!!!

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